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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 369 of 834

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Page 369

अध्याय ७५] शिवके निर्गुण एवं सगुणस्वरूपका निरूपण [३६७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अथानेनैव कर्मात्मा प्रकृतेस्तु प्रवर्तकः।<br>पुंसां तु पुरुषः श्रीमान् ज्ञानगम्यो न चान्यथा॥ १२<br><br>कर्मयज्ञसहस्त्रेभ्यस्तपोयज्ञो विशिष्यते।<br>तपोयज्ञसहस्रेभ्यो जपयज्ञो विशिष्यते॥ १३<br><br>जपयज्ञसहस्रेभ्यो ध्यानयज्ञो विशिष्यते।<br>ध्यानयज्ञात्परो नास्ति ध्यानं ज्ञानस्य साधनम्॥ १४<br><br>यदा समरसे निष्ठो योगी ध्यानेन पश्यति।<br>ध्यानयज्ञरतस्यास्य तदा सन्निहितः शिवः॥ १५इसी [शरीर]-से वे [परमात्मा] कर्मरूप होकर प्रकृतिका प्रवर्तन करते हैं। वे ऐश्वर्यशाली पुरुष (परमात्मा) मनुष्योंके लिये ज्ञानगम्य हैं; इसमें सन्देह नहीं है। तपोयज्ञ हजार कर्मयज्ञोंसे बढ़कर है, जपयज्ञ हजार तपोयज्ञोंसे बढ़कर है और ध्यानयज्ञ हजार जपयज्ञोंसे बढ़कर है। ध्यानयज्ञसे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है; ध्यान ज्ञानका साधन है। जब योगी समरसमें स्थित होकर ध्यानके द्वारा देखता है, तब शिव ध्यानयज्ञमें लीन उस [योगी]-को प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं॥ १२-१५॥
नास्ति विज्ञानिनां शौचं प्रायश्चित्तादिचोदना।<br>विशुद्धा विद्यया सर्वे ब्रह्मविद्याविदो जनाः॥ १६<br><br>नास्ति क्रिया च लोकेषु सुखं दुःखं विचारतः।<br>धर्माधर्मौ जपो होमो ध्यानिनां सन्निधिः सदा॥ १७<br><br>परानन्दात्मकं लिङ्गं विशुद्धं शिवमक्षरम्।<br>निष्कल सर्वगं ज्ञेयं योगिनां हृदि संस्थितम्॥ १८विज्ञानियोंके लिये शुद्धि, प्रायश्चित्त आदि कर्म आवश्यक नहीं हैं; ब्रह्मविद्याको जाननेवाले सभी लोग [ब्रह्म] विद्यासे पूर्णरूपसे शुद्ध हो जाते हैं। विचारकी दृष्टिसे ध्यानियोंके लिये लोकोंमें क्रिया, सुख, दुःख, धर्म, अधर्म, जप, होम आदि [आवश्यक] नहीं हैं; उनके लिये शिव-सन्निधि ही मुख्य है। परम आनन्दमय, विशुद्ध, कल्याणकारी, अविनाशी, निष्कल तथा सर्वव्यापी लिङ्गको योगियोंके हृदयमें [सदा] विराजमान जानना चाहिये॥ १६-१८॥
लिङ्गं तु द्विविधं प्राहुर्बाह्यमाभ्यन्तरं द्विजाः।<br>बाह्यं स्थूलं मुनिश्रेष्ठाः सूक्ष्ममाभ्यन्तरं द्विजाः॥ १९हे द्विजो! लिङ्ग दो प्रकारका कहा गया है—बाह्य तथा आभ्यन्तर। हे श्रेष्ठ मुनियो! स्थूल [लिङ्ग] बाह्य होता है और सूक्ष्म [लिङ्ग] आभ्यन्तर होता है॥ १९॥
कर्मयज्ञरताः स्थूलाः स्थूललिङ्गार्चने रताः।<br>असतां भावनार्थाय नान्यथा स्थूलविग्रहः॥ २०कर्मयज्ञमें निरत तथा स्थूलस्वभाववाले स्थूललिङ्गके अर्चनमें संलग्न रहते हैं। अज्ञानी जनोंकी भावनासिद्धिके लिये ही स्थूलविग्रह कल्पित किया गया है; इसमें दूसरा हेतु नहीं है।
आध्यात्मिकं च यल्लिङ्गं प्रत्यक्षं यस्य नो भवेत्।<br>असौ मूढो बहिः सर्वं कल्पयित्वैव नान्यथा॥ २१जो आध्यात्मिक सूक्ष्मलिङ्ग है, उसका प्रत्यक्ष दर्शन जिसे नहीं होता है, ऐसा वह अज्ञानी व्यक्ति 'सब कुछ बाहर है'—यह कल्पना करके ही पूजनादिमें प्रवृत्त होता है; इसमें सन्देह नहीं है।
ज्ञानिनां सूक्ष्मममलं भवेत्प्रत्यक्षमव्ययम्।<br>यथा स्थूलमयुक्तानां मृत्काष्ठाद्यैः प्रकल्पितम्॥ २२जैसे ज्ञानियोंके लिये प्रत्यक्षरूपसे सूक्ष्म, निर्मल तथा अव्यय (अविनाशी) लिङ्गकी कल्पना की गयी है, वैसे ही सामान्य लोगोंके लिये मिट्टी, काष्ठ आदिसे निर्मित स्थूल लिङ्ग प्रकल्पित है।
अर्थो विचारतो नास्तीत्यन्ये तत्त्वार्थवेदिनः।<br>निष्कलः सकलश्चेति सर्वं शिवमयं ततः॥ २३अतः विचार करनेसे निरवयव तथा सावयव—सब कुछ शिवमयं ही है। मोक्षरूप पुरुषार्थकी भी सत्ता नहीं है*—ऐसा अन्य तत्त्ववेत्तालोग कहते हैं।

* श्रीमद्भागवतके एकादश स्कन्धके अनुसार बन्धन मायामूलक है अर्थात् मिथ्या है, अतः मोक्षकी भी कोई सत्ता नहीं है।