श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
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अध्याय ५३] भुवनकोशवर्णनमें प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौंचद्वीपोंके महापर्वतोंका वर्णन २२७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रत्येकं पञ्चकान्याहुर्नैरकाणि विशेषतः।<br>अण्डमादौ मया प्रोक्तमण्डस्यावरणानि च॥ ४६<br><br>हिरण्यगर्भसर्गश्च प्रसङ्गाद्बहुविस्तरात्।<br>अण्डानामीदृशानां तु कोट्यो ज्ञेयाः सहस्रशः॥ ४७ | अवीचितक सभी विशेष रूपसे पाँच नरक कहे गये हैं। मैंने आदिमें अण्डका वर्णन किया और अण्डके आवरणोंका भी वर्णन किया एवं प्रसंगवश ब्रह्माकी सृष्टिका भी विस्तारसे वर्णन किया। इस प्रकारके हजारों-करोड़ों ब्रह्माण्डोंको जानना चाहिये॥ ४४—४७॥ |
| सर्वगत्वात्प्रधानस्य तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा।<br>अण्डेष्वेतेषु सर्वेषु भुवनानि चतुर्दश॥ ४८<br><br>प्रत्यण्डं द्विजशार्दूलास्तेषां हेतुर्महेश्वरः।<br>अण्डेषु चाण्डबाह्येषु तथाण्डावरणेषु च॥ ४९<br><br>तमोऽन्ते च तमःपारे चाष्टमूर्तिर्व्यवस्थितः।<br>अस्यात्मनो महेशस्य महादेवस्य धीमतः॥ ५०<br><br>अदेहिनस्त्वहो देहमखिलं परमात्मनः।<br>अस्याष्टमूर्तेः शर्वस्य शिवस्य गृहमेधिनः॥ ५१<br><br>गृहिणी प्रकृतिर्दिव्या प्रजाश्च महदादयः।<br>पशवः किङ्करास्तस्य सर्वे देहाभिमानिनः॥ ५२ | प्रधानके सर्वगामी होनेके कारण इन अण्डोंमें तिर्यक्, ऊपर तथा नीचे [सभी ओर] चौदह भुवन हैं। हे श्रेष्ठ द्विजो! उनमें प्रत्येक अण्डके हेतु महेश्वर हैं। अष्टमूर्ति [शिव] अण्डोंमें, अण्डोंके बाहर, अण्डोंके आवरणोंमें, अन्धकारके भीतर तथा अन्धकारके परे भी विद्यमान हैं। सम्पूर्ण जगत् इन महेश्वर, महादेव, धीमान्, देहरहित परमात्माका शरीर है। गृहस्थरूप इन अष्टमूर्ति शर्व शिवकी गृहिणी दिव्य प्रकृति है, महत् आदि इनकी सन्तानें हैं और सभी देहाभिमानी पशु इनके सेवक हैं॥ ४८—५२॥ |
| आद्यन्तहीनो भगवाननन्तः<br>पुमान् प्रधानप्रमुखश्च सप्त।<br>प्रधानमूर्तिस्त्वथ षोडशाङ्गो<br>महेश्वरश्चाष्टतनुः स एव॥ ५३<br><br>आज्ञाबलात्तस्य धरा स्थितेह<br>धराधरा वारिधराः समुद्राः।<br>ज्योतिर्गणः शक्रमुखाः सुराश्च<br>वैमानिकाः स्थावरजङ्गमाश्च॥ ५४ | वे [शिव] ही आदि-अन्तसे रहित, भगवान् अनन्त, पुरुष, प्रधान आदि (बुद्धि, अहंकार आदि) सात तत्त्व, प्रधान मूर्तिवाले, सोलह अंगोंवाले (पंचमहाभूत, दस इन्द्रियाँ, मन), अष्टमूर्ति तथा महेश्वर हैं। उन्हींकी आज्ञाके प्रभावसे पृथ्वी, पर्वत, मेघ, समुद्र, तारागण, इन्द्र आदि देवता, वैमानिक तथा स्थावर-जंगम सभी प्राणी स्थित हैं॥ ५३-५४॥ |
| दृष्ट्वा यक्षं लक्षणैर्हीनमीशं<br>दृष्ट्वा सेन्द्रास्ते किमेतत्विहेति।<br>यक्षं गत्वा निश्चयात्पावकाद्याः<br>शक्तिक्षीणाश्चाभवन्यत्ततोऽपि ॥ ५५ | लक्षणोंसे रहित यक्षरूपी शिवको देखकर इन्द्रसहित अग्नि आदि वे देवता 'यहाँ यह क्या है?'—ऐसा |