श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
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| २२४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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तिरपनवाँ अध्याय
भुवनकोशवर्णनमें प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौंचद्वीपोंके महापर्वतों, ऊर्ध्वलोकों तथा नरकोंका वर्णन, सर्वत्र सदाशिवकी व्यापकता एवं यक्षरूप शिव और भगवती उमाका माहात्म्य
| सूत उवाच | सूतजी बोले— प्लक्ष आदि सात द्वीपोंमें सात पर्वत हैं, जो सीधे, लम्बे तथा प्रत्येक दिशाओंमें फैले हुए हैं; वे वर्षपर्वतके रूपमें प्रतिष्ठित हैं॥ १॥ |
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| प्लक्षद्वीपादिद्वीपेषु सप्त सप्तसु पर्वताः।<br>ऋज्वायताः प्रतिदिशं निविष्टा वर्षपर्वताः॥ १ | मैं प्लक्षद्वीपमें स्थित सातों दिव्य महापर्वतोंका वर्णन करूँगा। पहला गोमेदक तथा दूसरा चान्द्र कहा जाता है। तीसरा नारद तथा चौथा दुन्दुभि नामवाला कहा गया है। पाँचवाँ सोमक तथा छठा सुमनस् नामवाला कहा जाता है, उसे वैभव [नामवाला] भी कहा गया है। सातवाँ पर्वत वैभ्राज नामसे प्रसिद्ध है। विशेष रूपसे ये ही सात पर्वत प्लक्षद्वीपमें बताये गये हैं॥ २–४॥ |
| प्लक्षद्वीपे तु वक्ष्यामि सप्त दिव्यान् महाचलान्।<br>गोमेदकोऽत्र प्रथमो द्वितीयश्चान्द्र उच्यते॥ २ | |
| तृतीयो नारदो नाम चतुर्थो दुन्दुभिः स्मृतः।<br>पञ्चमः सोमको नाम सुमनाः षष्ठ उच्यते॥ ३ | |
| स एव वैभवः प्रोक्तो वैभ्राजः सप्तमः स्मृतः।<br>सप्तैते गिरयः प्रोक्ताः प्लक्षद्वीपे विशेषतः॥ ४ | |
| सप्त वै शाल्मलिद्वीपे तांस्तु वक्ष्याम्यनुक्रमात्।<br>कुमुदश्चोत्तमश्चैव पर्वतश्च बलाहकः॥ ५ | शाल्मलिद्वीपमें भी सात पर्वत हैं, मैं क्रमसे उन्हें बताऊँगा। कुमुद, उत्तम, बलाहक, द्रोण, कंक, महिष और सातवाँ ककुद्मान् कहा गया है। कुशद्वीपमें भी सात उपद्वीप और कुलपर्वत हैं। मैं केवल नामसे ही संक्षेपमें उन्हें बताऊँगा। पहला विद्रुम तथा दूसरा हेमपर्वत कहा गया है। तीसरा द्युतिमान् एवं चौथा पुष्पित नामवाला बताया गया है। पाँचवाँ कुशेशय तथा छठा हरिगिरि [नामवाला] कहा गया है। सातवाँ पर्वत शोभासम्पन्न मन्दर है, यह महादेवजीका निवासस्थान है। जलोंका नाम मन्दा है; इसीलिये जलोंको धारण करनेसे इसका नाम मन्दर है॥ ५–९॥ |
| द्रोणः कङ्कश्च महिषः ककुद्मान् सप्तमः स्मृतः।<br>कुशद्वीपे तु सप्तैव द्वीपाश्च कुलपर्वताः॥ ६ | |
| तांस्तु सङ्क्षेपतो वक्ष्ये नाममात्रेण वै क्रमात्।<br>विद्रुमः प्रथमः प्रोक्तो द्वितीयो हेमपर्वतः॥ ७ | |
| तृतीयो द्युतिमान्नाम चतुर्थः पुष्पितः स्मृतः।<br>कुशेशयः पञ्चमस्तु षष्ठो हरिगिरिः स्मृतः॥ ८ | |
| सप्तमो मन्दरः श्रीमान् महादेवनिकेतनम्।<br>मन्दा इति ह्यपां नाम मन्दरो धारणादपाम्॥ ९ | |
| तत्र साक्षाद् वृषाङ्कस्तु विश्वेशो विमलः शिवः।<br>सोमः सनन्दी भगवानास्ते हेमगृहोत्तमे॥ १० | साक्षात् भगवान् वृषभध्वज विश्वेश्वर अमलात्मा शिव वहाँ उत्तम सुवर्णगृहमें पार्वती तथा नन्दीके साथ रहते हैं। पूर्वकालमें मन्दरने महाक्षेत्र अविमुक्तमें [अपनी] तपस्यासे महेश्वरको प्रसन्न किया था और उनसे महावरदान प्राप्त किया था॥ १०-११॥ |
| तपसा तोषितः पूर्वं मन्दरेण महेश्वरः।<br>अविमुक्ते महाक्षेत्रे लेभे स परं वरम्॥ ११ | |
| प्रार्थितश्च महादेवो निवासार्थं सहाम्बया।<br>अविमुक्तादुपागम्य चक्रे वासं स मन्दरे॥ १२ | उसने महादेवजीसे उमाके साथ वहाँ निवास करनेके लिये प्रार्थना की, तब वे [शिव] अविमुक्तक्षेत्रसे आकर नन्दी, अपने गणों तथा उमाके साथ मन्दर [पर्वत]-पर निवास करने लगे, इसीलिये वे उस पर्वतको नहीं छोड़ते हैं॥ १२ १/२॥ |
| सनन्दी सगणः सोमस्तेनासौ तन्न मुञ्चति।<br>क्रौञ्चद्वीपे तु सप्तेह क्रौञ्चाद्याः कुलपर्वताः॥ १३ |