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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 218 of 834

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Page 218
२१६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| स एव जगतां कालः पाताले च व्यवस्थितः।<br>विष्णोर्विश्वगुरोमूर्त्तिर्दिव्यः साक्षाद्धलायुधः॥ ६५॥<br><br>शयनं देवदेवस्य स हरेः कङ्कणं विभोः।<br>वने पनसवृक्षाणां सशुक़ा दानवादयः॥ ६६॥<br><br>किन्नरैरुरगाश्चैव विशाखकवने स्थिताः।<br>मनोहरवने वृक्षाः सर्वकोटिसमन्विताः॥ ६७॥<br><br>नन्दीश्वरो गणवरैः स्तूयमानो व्यवस्थितः।<br>सन्तानकस्थलीमध्ये साक्षाद्देवी सरस्वती॥ ६८॥<br><br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्ता वनेषु वनवासिनः।<br>असंख्याता मयाप्यत्र वक्तुं नो विस्तरेण तु॥ ६९॥ | वे पातालमें रहते हैं; वे ही समस्त लोकोंके काल हैं। वे विश्वगुरु विष्णुकी दिव्य मूर्ति हैं, साक्षात् हलायुध हैं, देवदेव विष्णुकी शय्या हैं और प्रभु शिवके कंकण (कंगन)-स्वरूप हैं॥ ६४-६५ १/२ ॥<br><br>दानव आदि शुक्राचार्यके साथ कटहलके वृक्षोंके वनमें और सभी उरग किन्नरोंके साथ विशाखवन (नारिकेलवन)-में रहते हैं। विविध प्रकारकी जातियोंवाले वृक्ष उस मनोहरवनमें हैं। नन्दीश्वर भी श्रेष्ठ गणोंके द्वारा स्तुत होते हुए वहाँ विराजमान हैं। सन्तानक (कल्पवृक्ष) क्षेत्रके मध्यमें साक्षात् सरस्वती देवी रहती हैं॥ ६६-६८॥<br><br>[हे विप्रो!] इस प्रकार मैंने इन वनोंमें निवास करनेवाले लोगोंका संक्षेपमें वर्णन किया; ये असंख्य हैं, विस्तारपूर्वक इनका वर्णन करनेमें मैं समर्थ नहीं हूँ॥ ६९॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे जम्बूद्वीपवर्णनं नामैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'जम्बूद्वीपवर्णन' नामक उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४९ ॥


पचासवाँ अध्याय

भुवनविन्यासमें विभिन्न कुलाचल पर्वतोंपर रहनेवाली देवयोनियों आदिका वर्णन

| सूत उवाच<br>शितान्तशिखरे शक्रः पारिजातवने शुभे।<br>तस्य प्राच्यां कुमुदाद्रिकूटोऽसौ बहुविस्तरः॥ १॥<br>अष्टौ पुराप्युदीर्णानि दानवानां द्विजोत्तमाः।<br>सुवर्णकोटरे पुण्ये राक्षसानां महात्मनाम्॥ २॥<br>नीलकानां पुराण्याहुरष्टषष्टिर्द्विजोत्तमाः।<br>महानीलेऽपि शैलेन्द्रे पुराणि दश पञ्च च॥ ३॥<br>हयाननानां मुख्यानां किन्नराणां च सुव्रताः।<br>वेणुसौधे महाशैले विद्याधरपुरत्रयम्॥ ४॥<br>वैकुण्ठे गरुडः श्रीमान् करञ्जे नीललोहितः।<br>वसुधारे वसूनां तु निवासः परिकीर्तितः॥ ५॥<br>रत्नधारे गिरिवरे सप्तर्षीणां महात्मनाम्।<br>सप्तस्थानानि पुण्यानि सिद्धावासयुतानि च॥ ६॥<br>महत्प्रजापतेः स्थानमेकशृङ्गे नगोत्तमे।<br>गजशैले तु दुर्गाद्याः सुमेधे वसवस्तथा॥ ७॥ | सूतजी बोले—इन्द्र शितान्तके शिखरपर विद्यमान सुन्दर पारिजातवनमें रहते हैं। उसके पूर्वमें कुमुदपर्वतकी चोटी है, वह बहुत विस्तृत है। हे श्रेष्ठ द्विजो! वहाँ दानवोंके आठ पुर कहे गये हैं। हे श्रेष्ठ द्विजो! पवित्र सुवर्णकोटरमें नीलक नामक महान् राक्षसोंके अड़सठ पुर बताये गये हैं॥ १-२ १/२ ॥<br><br>हे सुव्रतो! पर्वतश्रेष्ठ महानीलपर भी घोड़ेके समान मुखवाले प्रधान किन्नरोंके पन्द्रह पुर हैं और महान् पर्वत वेणुसौधपर विद्याधरोंके तीन पुर हैं॥ ३-४॥<br><br>श्रीमान् गरुड़ वैकुण्ठ पर्वतपर और नीललोहित रुद्र करंज पर्वतपर निवास करते हैं। वसुओंका निवास वसुधारमें बताया गया है। गिरिश्रेष्ठ रत्नधारपर महात्मा सप्तर्षियोंके सात पवित्र स्थान हैं, जो सिद्धोंके वाससे युक्त हैं॥ ५-६॥<br><br>पर्वतोंमें उत्तम एकशृंग पर्वतपर प्रजापतिका महान् आवास है। गजशैलपर दुर्गा आदि तथा सुमेधपर वसुगण |