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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 83

८२ स्पन्दकारिका
पदार्थों को निगल डालने वाले आप चिद्रूप में समावेश करते हुए मैं सदैव आपकी पूजा
करता हूँ—
'त्वामगाधमविकल्पमद्वयं, स्वं स्वरूपमखिलार्थघस्मरम् ।
आविशन्नहमुमेश सर्वदा, पूजयेयमभिसंस्तुवीय च ॥'
'भक्त्यावेशस्तु मे सदा' (१६।६)
'जहाँ इस अलौकिक चिदात्मा महादेव की पूजा की जाती है वहाँ कौन सी शोभा
नहीं होती, कौन सा आनन्द नहीं होता, कौन सी उत्कृष्ट सुखसम्पत्ति नहीं होती और
कौन सा मोक्ष नहीं होता ?'
का न शोभा न को ह्लादः का समृद्धिर्न वापरा ।
को वा न मोक्षः कोऽत्येष महादेवे यदर्च्यते ॥ (१७।२५)
'प्रत्यभिज्ञाकारिका' के ज्ञानाधिकार में उत्पलदेवाचार्य भगवान् की दास्य भक्ति
की चर्चा करते हुए प्रत्यभिज्ञा के प्रतिपादन की बात करते हैं—
'कथं चिदासाद्य महेश्वरस्य,
दास्यं जनस्याप्युपकारमिच्छन् ।
समस्त सम्पत्समवाप्ति हेतुं,
तत्प्रत्यभिज्ञामुपपादयामि ॥' (प्र०का०)
यहाँ 'भक्ति' को भगवान् की 'आह्लादिनी शक्ति' माना जाता है। 'भक्ति' भगवान् की
'आनन्द शक्ति' है । यहाँ 'भक्ति' भावना, गलदश्रुभावुकता या 'चित्त का द्रवीभाव' मात्र
नहीं है प्रत्युत् यह भगवान् में अपृथक् रूप से समवेत आनन्द शक्ति का उल्लास है । यह
परमात्मा की शाश्वत आनन्द शक्ति का उसके अपरिमेय आनन्दोल्लास की अभिव्यञ्जना
है । यह परमात्मा की अचिन्त्य शक्ति की (भक्त के हृदय में) अभिव्यक्ति है ।
[१०] मन्त्रविज्ञान और स्पन्दशास्त्र
'स्पन्दशास्त्र' ज्ञान-साधना, योग-साधना, मन्त्र-साधना एवं समावेशमयी भक्ति-
साधना—इन सभी में आस्था रखता है ।
मन्त्र विज्ञान के विषय में स्पन्दशास्त्र में मुख्यतः 'सहजविद्योदय स्पन्द निष्यन्द' में
प्रकाश डाला गया है । इसमें कहा गया है—
१. 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञ बल शालिनः ।
प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानिव देहिनाम् ॥ २६ ॥ (स्पन्दकारिका)
२. 'तत्रैव संप्रलीयन्ते शान्तरूपा निरञ्जनाः ।
सहाराधकचित्तेन तेन ते शिवधर्मिणः ॥ २७ ॥ (स्पन्दकारिका)
अर्थात् स्पन्दरूप आत्मबल के साथ तद्रूपता प्राप्त करने से प्रत्येक प्रकार के मन्त्र
में सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्वता, पूर्णता, सर्वव्यापकता, अमित तृप्ति, नित्यता, अप्रतिहत
स्वातंत्र्य आदि षडात्मक माहेश्वर बलों का संचार हो जाता है अतः वे इन बलों से अनन्त