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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 69

६८ स्पन्दकारिका
अज्ञान का कारण है। बौद्ध अज्ञान = कर्मोत्पन्न शरीर में होता है शरीर ही संसार है और
मायीय हैं शरीरभुवनाकारो मायीयः परिकीर्तित ।।
'सर्वो विकल्पों संसार:' ॥ = 'विकल्प' = संसार है । बौद्ध ज्ञान भी संसार का
ही आविर्भावक है । दीक्षा—पौरुष अज्ञान निवृत्त । पौरुष ज्ञान का अधिक महत्त्व है
(बौद्ध ज्ञान की अपेक्षा) ।
दीक्षा में पौरुष पाशों (मलों) का शोधन आवश्यक है । बौद्ध पाशों (मलों) का
निराकरण विवेक से होता है ।१
मोक्ष का तो स्वभाव ही ज्ञान है । अख्याति के अभाव को ही पूर्ण ख्याति कहते
हैं । प्रकाशानन्दघन आत्मा का तात्विक रूप पूर्ण ख्याति ही है । इसका प्रथन (संस्कार
दृढ़ता) ही 'मोक्ष' है । इस अज्ञान के अभाव में ही मोक्ष संभव है । 'तच्च ज्ञान
मात्रस्वभावम्' अख्यात्यभाव एव हि पूर्णाख्यातिः, सैव च प्रकाशानन्द घनस्यात्मन-
स्तात्विक स्वरूपं तत्प्रथनमेव मोक्ष इति ॥२
१. अज्ञान का अर्थ ज्ञान का अभाव नहीं है । अज्ञान का अर्थ है—अपूर्ण ज्ञान
ज्ञानाभाव नहीं— 'अतो ज्ञेयस्य तन्त्रस्य सामस्त्येनाप्रथात्मकम् ।
ज्ञानमेवं तदज्ञानं शिव-सूत्रेषु भाषितम् (तं०१।२६) ।
ज्ञेयस्य च परं तत्त्वं यः प्रकाशात्मक शिवः ।
शिवसूत्र का द्वितीय सूत्र है—'ज्ञानं बंध:' ज्ञाता, ज्ञान एवं ज्ञेय की त्रिपुटी में ही
समस्त दर्शनविज्ञान स्थित है ।३
ज्ञेय का परमतत्त्व प्रकाशात्मक शिव ही है । यह द्विविध है—
(क) वस्तु, स्थान, नाम आदि द्वैत की प्रथा पर आधृत ।
(ख) परतत्त्व, चिदानन्दघन परमशिव सर्वत्र समस्तता एवं समरसता से परिपूर्ण
परमतत्त्व ।४
द्वितीय तत्त्व की एकान्त सत्ता के विपरीत जब नीले, पीले, सुखदुःख आदि द्वैत
प्रथात्मक ज्ञान होते हैं तो ये ज्ञान ही अज्ञान बन जाते हैं, यही अपूर्णज्ञान है, ज्ञान
का अभाव नहीं । यही अपूर्ण ज्ञान बंध बन जाता है । यही संसार के अंकुर का
कारण है । यही संसृति का हेतु है । यही है शिवसूत्र का कथ्य ।५
'चैतन्यमात्मा' + 'ज्ञानं बंधः' इसे दो प्रकार से लिखा जा सकता है—
१. चैतन्यमात्माज्ञानं बंधः, २. चैतन्यमात्मा । ज्ञानं बंधः ॥
'त्मा' + 'ज्ञा' के मध्य 'अ' का प्रश्लेष करने पर 'ज्ञानम्' ही 'अज्ञानम्' बन जाता
है । अज्ञान का अर्थ है—अपूर्ण ज्ञान + ज्ञान का अर्थ है—द्वैत प्रथात्मक ज्ञान ।
१-३. विवेक । ४. तन्त्रालोक ।
५. विवेक ।