स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in context६४ स्पन्दकारिका
अनुपाय—समावेश विश्रान्त योगी को यह प्रतीत होने लगता है कि यह निखिल
समुल्लसित भावमण्डल पूर्णतः संवित्तिरूपी भैरवीभाव के प्रकाश में समाहित हो रहा है।१
'शांभवोपाय' का चरम रूप ही 'अनुपाय' है—
'साक्षादुपायेन इति शांभवेन । तदेव हि अव्यवहितं परज्ञानावाप्तौ निमित्तं स एव
परांकाष्ठां प्राप्तश्चानुपाय इत्युच्यते'' ।। (तन्त्रा० आ० १।१८२)
(२) शांभवोपाय—
हठपाक क्रम या शांभवोपाय—स्वात्मपरामर्श एवं स्वरूपोपलब्धि के लिए
सर्वोत्कृष्ट उपाय शांभवोपाय है जो अभेदात्मक स्तर पर स्थित है। इसमें अभेदभावना का
परामर्श आवश्यक है।
'संपूर्ण (प्रमाता-प्रमाण-प्रमेय रूप) जगत् मुझ परबोध शिव से ही उत्पन्न हुआ है।
वह अनतिरिक्त होने पर भी अतिरिक्तवत् मुझ में अवस्थित् एवं मुझसे सर्वथा अभिन्न
है।'—यही परामर्श 'शांभवोपाय' है—
'मत्त एवोदितमिदं मय्येव प्रतिबिम्बितम् ।
मदभिन्नमिदं चेति त्रिधोपायः स शांभवः' ।। (तन्त्रालोक आ० ३)
अभिनवगुप्त इस शांभव परामर्श को और सुस्पष्ट करते हुए उसका परामर्श इस
प्रकार निरूपित करते हैं—
मैं अपने आत्मारूपी चिदाकाश में विश्वावभासन कर रहा हूँ अतएव मैं ही विश्व-
स्रष्टा हूँ। संपूर्ण 'षडध्व' (वर्ण, पद, मन्त्र, कला तत्त्व, भुवन) मुझमें ही प्रतिबिम्बित है
अतः मैं ही स्थिति का सूत्रधार हूँ। यह संसार मुझ महाज्ञानमय अग्नि में लीन होता जा
रहा है। ऐसा सततानुसंधान करने से योगी शान्ति प्राप्त कर लेता है। अनन्त वैचित्र्या-
त्मक संसार के स्वप्न-गृह को दग्ध करने वाला मैं हुताशन हूँ। यही तुरीय पद एवं
शिवत्व प्रदान करता है।२
इसे 'शांभव समावेश' भी कहते हैं। शांभव समावेश में अनन्तः चिन्तन का
भी त्याग कर दिया जाता है। यहाँ किसी विकल्प की उपयोगिता नहीं रह जाती।
१. तन्त्रालोक (२ अ० ३५) ।
२. षडध्व जातं निखिलं मय्येव प्रतिबिम्बितम् ।
स्थितिकर्ताहमस्मीति स्फुटेयं विश्वरूपता ।।
सदोदितमहाबोधज्वालाजटिलतात्मनि ।
विश्वं द्रवति मय्येवदिति पश्यन् प्रशाम्यति ।।
अनन्तचित्रसद्दर्भसंसारस्वानसद्मनः ।।
पोषकः शिव एवाहमित्युल्लासी हुताशनः ।
जगतः सर्वमत्त प्रभवति विभेदेन बहुधा ।।
तथाप्येतद्रूढं मयि विगलितेत्वत्र न परः ।
तदित्यं यः सृष्टि-स्थिति-विलयमेकीकृतवशा-
दनंशं पश्येत्स स्फुरति हि तुरीयं पदमिति ।।—तन्त्रालोक (आ० ३, २८३-२८७)