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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 63

६२ स्पन्दकारिका
पश्यन्ती → ┌ पश्यन्ती, परावाक्
(अभिनवगुप्त) │ महापश्यन्ती ┌────────┴────────┐
└ परम महापश्यन्ती प्रकाशांश = अम्बिका विमर्शांश = शान्ता
(सदाशिवेश्वर दशा) └────────┬────────┘
परावाक्
‘मूलाधारात् प्रथममुदितो यश्च भावः पराख्यः ॥’ (प्र०सा०तन्त्र)
विमर्शात्मा स्वातन्त्र्यरूप प्रतिभा (परावाक्) ही परमशिव की शक्ति है जिसके कारण शिव ‘शक्तिमान्’ कहलाते हैं ।
┌ शब्द ब्रह्म — अपर प्रणव ॥ ┌ शब्दमयी
ब्रह्म → ┼ अर्थ ब्रह्म — पर प्रणव ॥ सृष्टि → ┼ अर्थमयी
└ पर ब्रह्म └ चक्रमयी
निश्चल (निस्पन्द) परावाक् रूप प्रणवात्मक कुण्डलिनी शक्ति ही ‘प्रकृति’ है ।
भास्करराय—(१) शब्दब्रह्मरूप बीज की उच्छूनावस्था = ‘परावाक्’ (२) स्फुटितावस्था = ‘पश्यन्तीवाक्’ (३) मुकुलित, अव्यक्त किन्तु दलद्वयावस्था = ‘मध्यमावाक्’ (४) सम्यक् विकसितावस्था = ‘बैखरीवाक्’—(‘सौभाग्य भास्कर’) ‘कुण्डलिनी’ वाक्रूपा है ।
कुण्डलिनी— ┌ मूलाधार में ‘अग्निकुण्डलिनी’ ।
│ हृदय में ‘सूर्य कुण्डलिनी’ ।
│ भ्रूमध्य में ‘सोमकुण्डलिनी’ ।
└ मूलाधार-अधोगत वाग्भावाकार त्रिकोण में—‘समष्टि कुण्डलिनी’ ।
सर्वशिवत्ववाद का प्रतिपादन—आचार्य सोमानन्द पाद कहते हैं—
‘सर्वशिवत्वमिदानीं स्वरूपेणोपपादयितुमाह—‘अथेदानीं प्रवक्तव्यं यथा सर्व शिवात्मकम् ।’ (‘शिवदृष्टि’) ॥
[७] साधनान्तर्गत आत्मचैतन्य की विविध अवस्थायें एवं मोक्ष के उपाय—(तन्त्रालोकः आ०५)

'शांभवो पाय' या 'अनुपाय' का स्तर(शांभव)(शाक्त)(आणव)
'शांभवो पाय' या 'अनुपाय' का स्तरअभेद की चिन्मयदशा में प्रथम, सर्वोत्कृष्ट एवं उत्मोत्तम दशा—‘स्वात्मसाक्षात्कार’ (परप्रमाता): ‘शांभवोपाय’ (योगी का प्रवेश = ‘भैरव महाभाव’ में) सर्वात्म्य-ऐश्वर्य ब्रह्मद्रव का उद्रेक = पूर्ण तत्त्वामृत का निष्यंद ॥भेदाभेदमयीदशा (इसमें इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से ज्ञत्व एवं कर्तृत्व की संकुचित अनुभूति होती है) ‘बुद्धिप्रमाता’ = स्वान्तःकरण की वृत्तियों के संचार से बुद्धि प्रमाता विवश हो जाता है । ‘शाक्तोपाय’ ।भेदावस्था (देह प्रमाता की अनुभूति) सुख,दुःख, इष्ट अनिष्ट आदि का संचार होता रहता है । (आणवोपाय) ‘मोक्ष’ = ‘मोक्षो हि नाम नैवान्यः स्वरूपप्रथनं हि सः ॥’ —तन्त्रा०