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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 53

५२ स्पन्दकारिका
रखकर सृष्टि का अवभासन करती है और यही शिव का दर्पण है—
‘सा जयति शक्तिराद्यानिजसुखमयनित्यनियमाकारा ।
भाविचराचरबीजं शिवरूप विमर्श निर्मलादर्शः ॥’ (का०)
स्वातंत्र्यवाद—‘स्वातंत्र्य’ शिव की पराशक्ति है। ‘आनन्द’ इसका अपर पर्याय
है। परमात्मा की इच्छा का अनभिहत प्रसार ही स्वातंत्र्य है—‘स्वातंत्र्यं च नाम यथेच्छं
तथेच्छाप्रसरस्य अविघातः (ई० प्रत्यभिज्ञा वि०)।
यह दुर्घटकारित्व है—‘एतदेव स्वातंत्र्यं दुर्घटकारित्वम् ॥
परमात्मा का यही दुर्घटकारित्व ‘नित्योदित परावाक्’ है। अविभक्त या अन्तर्लीन
विमर्शात्मक शिव ही ‘परमशिव’ है ‘स्वातंत्र्य’ का प्रसार ही जड़चेतन जगत् है।
[५] जीव तत्त्व
जीव परमार्थतः शिव है। शिव एवं जीव में निम्न भेद है—
‘स्वांगरूपेषु भावेषु प्रमातो कथ्यते पतिः ।
मायातो नेदिषु क्लेश कर्मादिक्लुषः पशुः ॥’—उत्पलदेव
विकल्प-ज्ञान ‘परामृतरस’ एवं ‘स्वातंत्र्य’ दोनों जीव से छीन लेता है। (स्पन्दका०
४६)॥
भगवान् स्वस्वातंत्र्य शक्ति की महिमा से अपने को संकुचित की भाँति आभासित
करते हुए ‘अणु’ या जीव कहलाता है—अर्थात् पशुत्व भी शिव की एक लीला या
आत्मप्रच्छादन क्रीडा है—एक आभासन है—
‘इत्थं सर्वशक्तियोगेऽपि आभिर्मुख्याभिः शक्तिभिरुपचर्यते, स च भगवान् स्वातंत्र्य-
शक्तिमहिम्ना स्वात्मान संकुचितमिव आभासयन् अणुः’ इति उच्यते।
‘व्यापको हि शिवः स्वेच्छाक्लृप्तसंकोचमुद्रणात् । विचित्रकलकर्मोदिवशात्तत्त-
च्छरीरभाक्’ शिव की स्वात्मप्रच्छादन-क्रीडा ही उसे जीव बना देती है। शिव एवं जीव
में परमार्थतः कोई भेद नहीं है।¹
वह भगवान् अपनी मायाशक्ति के द्वारा (अपनी स्वातंत्र्यशक्ति से अभिन्न रहकर
भी) अपने द्वारा अपने को संकुचित जैसा अवभासित करता हुआ।
१. ‘विज्ञानाकल’ २. ‘प्रलयाकल’ ३. एवं ‘सकल’ बन जाता है।
(क) ‘विज्ञानाकल’ : एकमलोपेत ।
(ख) ‘प्रलयाकल’ : मलद्वयोपेत ॥
(ग) ‘सकल’ : मलत्रयोपेत ॥²
‘पञ्चकंचुक’ शिव को मलावृत करके एवं उसके स्वातंत्र्य को संकुचित करके
मलावृत संसारी बना देता है। शाब्दी शक्ति भी उसे ‘पशु’ बनाने में योग देती है।
इसलिए ‘स्पन्दकारिका’ में कहा गया है—
१-२. जन्ममरणविचारः (वामदेव)।