स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in contextतृतीयः निष्यन्दः ४१७
क्योंकि एक ही चेतना शिव भी है और वही जीव भी है—वही बन्धन भी है और वही
मुक्ति भी है तथा परमार्थतः न बन्धन है न तो मुक्ति है—'न मे बन्धो न मोक्षो मे' ॥१
ये मिथ्या भी नहीं है क्योंकि—'न सावस्था न यः शिवः ।' शिव एवं जीव की
एकता का ज्ञान ही मुक्ति है और इसका अपरिज्ञान ही मुक्ति है—'शिवजीवयोरभेद एव
उक्तः । एतत्तत्वपरिज्ञानमेव मुक्तिः एतत्तत्वापरिज्ञानमेव च बन्धः ॥ भला चैतन्य को
बन्धन कैसा ? जड़ चेतनात्मक जगत् तो परमशिवरूप है फिर उसको बन्धन कैसा ?
'यदि जीवजडात्मनो विश्वस्य परमशिवरूपं चैतन्यमेव स्वभावः तत् कथम् अयं
बन्धः ?' २
'बन्धन' का स्वरूप—'बन्धन' का स्वरूप क्या है?
आचार्य क्षेमराज कहते हैं—परमेश्वर अपनी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' के द्वारा अपने
सत्स्वरूप के गोपन को आभासित करते हैं (और यह कार्य वे 'महामाया' द्वारा सम्पन्न
करते हैं ।) इसके परिणाम स्वरूप मायाप्रमाता पर्यन्त सभी सत्ताएँ सङ्कोचावभासित होने
के कारण उनका शिवाभेद को भूलकर शिव से अपना भेद मानना 'अपूर्णम्मन्दतात्मक-
आणवमलतत्त्वसंकुचितज्ञानात्मा' हो जाना ही 'बन्धन' है—
(१) 'परमेश्वरेण स्वस्वातन्त्र्य-शक्त्याभासितस्वरूपगोपनारूपया महामाया शक्त्या
.... माया प्रमात्रन्तं सङ्कोचोऽवभासितः स एव शिवाभेदाख्यात्मका ज्ञानस्वभावोऽपूर्णा-
म्मन्यतात्मकाणवमलसतत्त्वसंकुचितज्ञानात्मा 'बन्धः' ।३
(२) आत्मा में अनात्मा एवं अनात्मा में आत्मा भ्रमात्मक अवबोध भी 'बन्धन' है—
(३) एवमात्मनि अनात्मताभिमानरूपाख्यातिलक्षणाज्ञानात्मकं ज्ञानं केवलं बन्धो ।४
(४) 'यावद् अनात्मनि शरीरादौ आत्मताभिमानात्मकम् अज्ञानमूलं ज्ञानमपि बन्ध
एव ॥'५
(५) सुख दुःख मोह आदि की अध्यवसाय वृत्ति से युक्त जो भेदावभासनात्मक
ज्ञान है वही बन्धन है ।
'सुखदुःखमोहमयाध्यवसायादिवृत्तिरूपं तदुचितभेदावभासनात्मकं यत् ज्ञानं तत्
बन्धः' ।६
(६) अन्तः सुखादिं संवेद्य व्यवसायादिवृत्तिमत् ।
बहिस्तद्योग्यनीलादिदेहादिविषयोन्मुखम् ॥
भेदाभासात्मकं चास्य ज्ञानं बन्धोऽणुरूपिणः ।
तत्पाशितत्वादेवासावणुः संसरति ध्रुवम् ॥७
१. विज्ञानभैरव । २. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।
३-७. क्षेमराज—शिवसूत्रविमर्शिनी ।
स्पं० २७