स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in context५० स्पन्दकारिका
'चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परावाक् स्वरसोदिता ।
स्वातंत्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मतः ॥
(ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका अ० १। आ० ५)
'पूर्णत्वात् परा, वक्ति विश्वं अभिलपति प्रत्यवमर्शेन इति च वाक् ॥ (ई० प्र० वि०)
'पश्यन्ती' परावाक् की उत्तरवर्ती वाच्यवाचकात्मकविश्व विकास की द्वितीय कोटि है ।
१. 'पश्यति सर्वं स्वात्मनि कारणानां सरणिमपि यदुत्तीर्णा ।
तेनेयं पश्यन्तीत्युत्तीर्णेत्यप्युदीर्यते माता ॥ (सौभाग्य सुधोदय)
२. पश्यन्तीव न केवलमुत्तीर्णा नापि बैखरीव बहिः ।
स्फुटतर निखिलावयवा वाग्रूपा मध्यमा तयोरस्मात् ॥
वर्णों के अष्ट वर्ग की अधिष्ठात्री देवियाँ—
| 'ब्राह्मी'-क वर्ग | 'माहेश्वरी'-च वर्ग | 'कौमारी'-ट वर्ग | 'वैष्णवी'-त वर्ग |
| 'वाराही'-प वर्ग | 'ऐन्द्री'-य वर्ग | 'चामुण्डा'-श वर्ग | 'महालक्ष्मी'-अ वर्ग |
इसी शब्द राशि से समुत्थित शक्ति वर्ग के भोग हैं जीव और इसी भोग्यता के
कारण वे पशु बन जाते हैं—
शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् ।
कलाविलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥ (स्पन्द० ४५)
अद्वैतवादी दृष्टि का वैलक्षण्य—
स्वरूपावरण में भी शब्द एवं शाब्दी शक्तियाँ ही कारण हैं—
'स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोत्थिताः ।
यतः शब्दानुरोधेन न विना प्रत्ययोद्भवः ॥
(स्पन्दकारिका० ४७)
शांकर अद्वैत भी अद्वैत है और माहायानिकों का शून्याद्वैत एवं विज्ञानवादियों का
विज्ञानाद्वैत भी अद्वैत है किन्तु स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा का अद्वैत उनसे भिन्न है उसमें दो का
अभिन्न सामरस्य है और इसका ब्रह्माद्वैत से मतवैषम्य है—क्षेमराज कहते हैं 'इह
ईश्वराद्वयदर्शनस्य ब्रह्मवादिभ्यः अयमेव विशेषः ।'
[४] शिव और शक्ति
तत्त्व एवं शिव तथा शक्ति—
प्रत्यभिज्ञा एवं स्पन्द दर्शन में मुख्यतः दो तत्त्व स्वीकृत हैं और वे हैं—१. शिव,
२. शक्ति । तात्त्विक दृष्टि से तो दो नहीं एक तत्त्व है और वह है 'परमशिव' क्योंकि
'शक्ति' उसका स्वभाव है, धर्म है उसका मुख है—'शैवी मुख मिहोच्यते ।'
यह वह तत्त्व है जो कि शिव में समवेत दृष्टि से अन्तर्लीन है । इसीलिए
'कामकलाविलास' में कहा गया है—