स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in context४०८ स्पन्दकारिका
वस्तुसमूह का विश्रान्ति स्थान वही प्रत्यवमर्शात्मक परावाक् स्वरूप चिति, ज्ञान,
सङ्कल्प, अध्यवसाय, स्मृति एवं संशय के नाम से कही गई है ।
'माया शक्त्या विभोः सैव भिन्नसंवेद्यगोचरा ।
कथिता ज्ञानसङ्कल्पाध्यवसायादिनामभिः ॥'१
स्वप्नादिक अवस्थाओं, देह, प्राण, सुख दुःख आदि द्वारा परिबद्ध मनुष्य अपनी
माहेश्वरी चिति शक्ति को नहीं पहचानता । जो ज्ञानात्मक अमृत सिन्धु में फेनपिण्ड के
समान विश्व को देखे वही साक्षात् शिव है ।२
अहंता और पूर्णतम सिद्धि—तांत्रिक त्रिक दृष्टि १. परिमित अहंता का त्याग ।
२. भगवत्स्वरूप अहंता का ग्रहण । 'विश्वाहंता' परम सिद्धि है—परम उपलब्धि है ।
विश्व में अपने शिवस्वरूप को देखना अहंपरामर्श के प्रकार—शुद्ध अहंपरामर्श और
मायीय अहं परामर्श हैं ।
(१) शुद्ध परामर्श—विश्व से अभिन्न रूप में विद्यमान संविन्मात्र में या विश्व की
छाया से अस्पृष्ट स्वच्छ आत्मा में होता है ।
(२) मायीय या अशुद्ध परामर्श—वेद्यस्वरूप देह, बुद्धि, प्राण, शून्य आदि को
आलम्बन बनाता है ।
विज्ञानभैरव : 'सर्वं देहं चिन्मयं हि जगत् वा परिभावयेत् ।
युगपन्निर्विकल्पेन मनसा परमोदयः ।। (६२)
(१) ब्रह्मवादी—परम ज्ञान, परमोच्चता, परमोपलब्धि, पूर्णता एवं परमसिद्धि
'अहं ब्रह्मास्मि' की अनुभूति है ।
(२) शाक्त = परम ज्ञान, परमोच्चता, परमोपलब्धि, पूर्णता, परमसिद्धि एवं
आत्म विकास की पराकाष्ठा—
'अहं देवी न चान्योस्मि' की अनुभूति में है ।
(३) शैव—परमज्ञान, परमोच्चता, परमोपलब्धि, पूर्णता, परमपद की प्राणि,
परमतत्त्वरूपता, परम सिद्धि एवं अपने स्व का सर्वोच्च विकास—
'शिवोऽहं शिवोऽहं शिवोऽहं शिवोऽहं' की अनुभूति में है ।
(४) बौद्ध—परम ज्ञान, परमोच्चता, परमोपलब्धि, पूर्णता, परम पद का
अधिगम, परम तत्त्वज्ञा, परमसिद्धि एवं अपने स्व का पूर्णतम विकास 'विज्ञान' एवं
'शून्य' या शून्यस्थानीय 'महासुख' की प्राप्ति में है ।
(५) त्रिक, स्पन्द, क्रम (काश्मीरीय शैवदर्शन) परमज्ञान, परमोच्चता,
परमोपलब्धि, पूर्णता, परमपद की प्राप्ति, परमतत्त्व रूपता, परमसिद्धि, अपने स्व का
पूर्णतम विकास, 'चक्रेश्वरत्व' 'नित्योदित समाधि' 'स्वरूपावस्थान' 'स्वात्मपरामर्श'--
इस अनुभूति में है कि—
१-२. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।