स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in contextतृतीयः निष्यन्दः ४०५
'भूतानि तन्मात्रगणेन्द्रियाणि,
मूलं पुमान्कञ्चुकयुक्त्यशुद्धम्।
विद्यादि शक्त्यन्तभियान्ससंवित्,
सिन्धोस्तरंगप्रसरप्रपंचः ॥'
'स अल उत्पुरिपुण्णा उ, स अल्ल उत्त उत्तिण्ण।
परि आणह अत्ताण उ, परि मसिनेण समाण उ ॥' १
'स्वातन्त्र्यशक्ति की महिमा से संसार में संसरण करते हुए परिमितप्रमातृता का
अवलम्बन करने वाले एक ही आदिदेव का यह अनेकात्मक तत्त्वप्रसार है जो कि जगत्
कहलाता है—
'एकस्यैव आदिदेवस्य स्वातन्त्र्यमहिम्ना संसारे संसरतः परिमितप्रमातृताम् अव-
लम्बमानस्य तत्त्वप्रसरः ॥' २
मुक्ति = भोक्तृ भाव एवं चक्रेश्वरत्व की प्राप्ति—'मुक्ति' क्या है? उसकी प्राप्ति
की पद्धति क्या है?
'इच्छोपाय' 'ज्ञानोपाय' 'क्रियोपाय' या 'अनुपाय' के माध्यम से पारमात्मिकी
अनु-ग्रह शक्ति, शक्तिपात से पवित्रीभूत होकर तथा दीक्षादिक उपायों द्वारा यह
बन्धनग्रस्त अणु अपने 'संविदानन्दविश्रान्त, अद्वय एवं निजी स्वस्वरूप का साक्षात्कार
करता है—परामर्श करता है और इसके द्वारा ही वह अपने मौलिक एवं नित्य स्वस्वरूप
की प्राप्ति करता है और शिवत्व प्राप्त कर लेता है—
'कदाचित्परमेश्वरानुग्रहशक्तिपातपवित्रितः केनापि दीक्षादिना उपायेन संविदानन्द-
विश्रान्त अद्वयं निजं रूपं परामृशति, ततः स्वरूपमालम्बते ॥' ३
इसके अनन्तर वह 'शिव' बन जाता है—
तत्क्षणाद्भोपभोगाद्वा देहपाते शिवं व्रजेत् ॥ ४
ब्राह्मी आदि पशु शक्तियों का समुदाय विकल्पों के अनन्त अरण्य में दिग्भ्रमित
करके 'अणु' को स्वस्वरूप के चिन्तन से विरत करके उसे अपने भोक्ताभाव से च्युत
करके भोग्यभाव में अवतरित करके उसे जो बन्धन में डाल देती हैं उससे मुक्ति का
उपाय है।
(१) स्वरूप का परामर्श—(मलों से मुक्ति। पुर्यष्टक से मुक्ति)
(२) आत्म-प्रत्यभिज्ञा (शिवत्व की प्राप्ति)
(३) चक्रेश्वरत्व की प्राप्ति (रामस्त शक्तियों का स्वामित्व)
(४) अहं विमर्शात्मक अनुसंधान (चित्त का चित् शक्ति में लय और स्वस्वरूपा-
नुभूति)
१-३. वामदेव भट्टाचार्यः 'जन्ममरणविचार'। ४. मालिनीविजय।