स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
DevanagariHindipublished519 pages
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Read in contextPage 497३१६ स्पन्दकारिका
३१६ स्पन्दकारिका
जब सूक्ष्मतन्मात्रा अपनी सामान्यावस्था त्याग करके विशिष्टावस्था ग्रहण कर लेती
है तब स्थूलरूप वाले शब्द स्पर्श, रूप, रस एवं गंध विशिष्ट धर्मों (विशेषताओं) से
उपरांजित हो जाते हैं ।
सामान्य स्वरूप विशेष स्वरूप
(१) शब्द तन्मात्रा — शब्द गुण विशिष्ट स्थूल आकाश
(२) शब्द स्पर्श तन्मात्रा — स्पर्श गुण विशिष्ट स्थूल वायु
(३) शब्द स्पर्श-रूप तन्मात्रा — रूप गुण विशिष्ट स्थूल तेज
(४) शब्द-स्पर्श-रूप-रस तन्मात्रा — रस गुणविशिष्ट स्थूल जल
(५) शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध तन्मात्रा — गंधगुणविशिष्ट स्थूल पृथ्वी ।
शरीर भी एक पुर्यष्टक है । सूक्ष्मतन्मात्राओं का स्थूल कार्य होने के कारण शरीर
को भी 'स्थूल पुर्यष्टक' कहा गया है और यही बन्धन का कारण है ।
शैवदर्शन में 'बन्धन' का स्वरूप—
शैवदर्शन बन्धन को कोई स्वतन्त्र तत्त्व नहीं मानता ।
(क) जैनियों ने कहा है कि आश्रव ही बन्धन है, जीव और कर्मों का संयोग ही
बन्धन है ।
(ख) कर्म पुद्गलों के जीव में प्रवेश करने के पूर्व जीव के भावों में जो एक
परिवर्तन होता है उसे 'भावास्रव' एवं फिर कर्मपुद्गलों का शरीर में प्रवेश—'द्रव्यास्रव'
है—तेल से लिप्त होना 'भावास्रव' एवं उस पर धूल चिपकना द्रव्यास्रव है—४२
प्रकार के कर्मपुद्गलों का जीवों में यह प्रवेश रूप 'आस्रव' ही बन्धन के कारण है और
यह प्रक्रिया ही बन्धन है ।
'सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः' (उमास्वामी) कहकर उमास्वमी ने इन त्रिरत्नों
के आचरण को ही मोक्षमार्ग की आख्या दी है ।
(ग) शैवदर्शन के अनुसार—'मोक्षः कर्मक्षयाश्रयः' 'मोक्ष, रागक्षयाद्भवोत्'
('ईश्वरसिद्धि'—उत्पलदेव)—बन्धन-मोक्ष में कोई भेद ही नहीं है—
(घ) एतौ बन्धविमोक्षौ च परमेश्वरस्वरूपतः ।
नभिद्यते न भेदो हि तत्वतः परमेश्वरे ॥ (बोध पं०द०)
बन्धनोच्छेद की प्रक्रिया—यह स्पन्द शास्त्र का उपसंहार सूत्र है । पशु का जो
'बन्धन' है और जिसके कारण वह संसृति-चक्र में फँसा हुआ है उसका उच्छेद कैसे
किया जाय?—इसका विवेचन ही इस कारिका की प्रतिपाद्य विषयवस्तु है ।
'स्पन्दसन्दोह' में भट्टकल्लट कहते हैं—'यदा पुनस्त्वेकस्थूले सूक्ष्मे वा संरूढ़ो
लीनचितः, तदा तस्य प्रत्ययोद्भवस्य लयोद्भवौ ध्वंसप्रादुर्भावौ नियच्छन् कुर्वन् भोक्तृतां
प्राप्नोति । ततः चक्रेश्वरो भवेत् सर्वाधिपतिर्भवेत् ॥' १
१. भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व'