स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
DevanagariHindipublished519 pages
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तृतीयः निष्यन्दः ३६३
- सरोजिनी *
'प्रत्ययोद्भव', विकल्प-ज्ञान 'शिव' से उसके 'स्वातन्त्र्य' एवं 'परामृतरस' दोनों
को छीन लेते हैं । विकल्पों की महासमष्टि ही बन्धनरूप जगत् है और निर्विकल्प
शाक्तभूमि में (स्पन्द तत्त्व) में प्रवेश ही मुक्ति है ।
तस्य = उसका । पशु का । यः प्रत्ययानां = लौकिक शास्त्रीय विकल्पों का तथा
तदधिवासित भिन्नार्थज्ञानों के विकल्पों का । प्रत्ययोद्भव = विकल्प ज्ञान का उदय ।
उद्भवः = विनाशान्त्रात उत्पाद ।
परस्यामृतरसस्य = चिद्धन आनन्द के प्रसरण का ।
अपाय = निमज्जन ॥ चिद्भूमि = The state of supreme concious-
ness प्रत्ययोद्भव = ज्ञानोत्पत्ति (Origination of cognition) प्रत्यभिज्ञाविर्भाव ।
परामृतरस = स्वस्वरूप (भट्टकल्लट) ।
प्रत्ययोद्भव—स्वरूपविकल्पहीन स्वरूप में—प्रमेय पदार्थों से सम्बद्ध विकल्पा-
त्मक संवेदनों या ज्ञानों का आविर्भाव होना ही प्रत्यय का उद्भव है । प्रत्यय—विकल्प
ज्ञान, विचार, ज्ञान ।
अब ग्रन्थकार यह विवेचना करता है कि बन्धनग्रस्त जीव किस प्रकार ऐसा बना
दिया गया एवं वह अपनी प्रत्यभिज्ञाशक्ति (Cognitive power) के सीमित हो जाने से
कष्टों में कैसे पड़ गया?
चिद्भूमि परामृशित न होने के कारण अविद्यमान प्रतीत होती है यद्यपि जब अकेला
पदार्थ (Individual object) प्रत्यभिज्ञात (Cognised) किया जाता है तब भी
उसकी सत्ता बनी रहती है । इस सांसारिक ज्ञान के उद्भव के कारण प्राणी बन्धनग्रस्त
होकर स्वातन्त्र्य से शून्य एवं बद्ध (Feltered soul) होकर जीवन यापित करता है ।
शिवसूत्र में 'ज्ञानं बन्धः' यही प्रतिपादित करता है ।
मदालसा ने अपने पुत्रों को यही उपदेश दिया था—
तातेति किंचित्तनयेति किंचित्, अम्बेति किंचिद्दयितेति किंचित् ।
ममेति किंचिन्न ममेति किंचित्, भौते संघे बहुधा मा लपेथाः ।।'
(मा० पु० २५।१५) भौतिकवाद में अधिक संसक्त नहीं होना चाहिए । पिता,
पुत्र, माता, प्रिय, मेरे, मेरे नहीं—के भौतिक (सांसारिक) सम्बन्धों के सम्पर्क में संलग्न
नहीं रहना चाहिए ।
ज्ञान के विभिन्न पदार्थों के क्षेत्र में, तीव्र एवं मन्द प्रक्रिया द्वारा प्रत्ययों का
आविर्भाव हुआ करता है ।
(१) जब भेदात्मिका दृष्टि बनी रहती है तभी तक जीव 'बद्ध' बना रहता है ।
(२) जैसे ही 'सब कुछ आत्मामय है'—'सब कुछ' अपने ही स्वरूप की बाह्य
अभिव्यक्ति है—'सब' मैं ही है—इसका ज्ञान हो जाने पर जीव मुक्त हो जाता है—