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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 450 of 519

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Page 450

तृतीयः निष्यन्दः ३४९
सर्वदा = समस्त अनुभव की दशाओं में । प्रबुद्धस्तिष्ठेत् = प्रतिपादित
उपदेशों के अभ्यास से अनिमीलितसम्यक् ज्ञान दृष्टि वाला होकर जाग्रत हुआ स्थित
रहता है । किस प्रकार? ज्ञानेन = संवेदन के द्वारा । गोचरं = विषय को । आलोच्य =
(परिच्छेद्य) = सत्यासत्य का विवेचन करके । (आलोचन = देखना, परख, गुणदोष
विवेचन) ।
आरोपयेत् = अर्पित करना चाहिए ।। अभिन्न रूप से प्रतिपादित करना चाहिए
ततश्च = और उसके द्वारा । समस्त भावों के एक प्रमातृस्वरूपाभेद की प्रतिपत्तिरूप
आरोपण से ।। अन्येन = व्यतिरिक्ततापूर्वक अवभासमान प्रमेयों के द्वारा ।। वक्ष्यमाण
कलाद्यात्मक भावजात द्वारा । न पीड्यते = पीड़ित नहीं किया जाता । अहंभाव प्रति-
पत्तिरूपविनश्वर भाव द्वारा संसार-चक्र में, बन्धन के पाश से बन्धकर तिरस्कृत नहीं
होता ।।
कदर्थना = पीड़ा, अत्याचार । कदर्थित = तिरस्कृत, घृणित । तुच्छीकृत ।।
अत्याचार पीड़ित, तुच्छ। सारांश—
प्रमाता जिन-जिन रूपादिक अर्थों को चक्षु आदि के ज्ञान से आलोचना करता
है—निश्चय करता है (निश्चिनोति)—वे वे निश्चयावस्था में प्रामातृरूप से अभिन्न होते
हैं । निश्चितत्व वस्तु का प्रकाशमानत्व है । वह प्रकाशमान होने के कारण अभिन्न है
क्योंकि वह अन्य वस्तु बन ही नहीं सकता क्योंकि प्रकाश व्यतिरिक्त रूप संभव है ही
नहीं क्योंकि तब रूप प्रकाशित ही नहीं होगा । रूप की अभिव्यक्ति प्रकाश से ही संभव
है न कि प्रकाशाभाव से ।¹
भट्टकल्लट की व्याख्या—'स्पन्दकारिकावृत्ति' में भट्टकल्लट इस कारिका की
व्याख्या करते हुए कहते हैं—
'प्रबुद्धोऽसंकुचितशक्तिः सर्वकालं तिष्ठेत्, ज्ञानेनालोच्य गोचरमज्ञेयं परिच्छिद्य ।
एवमेकत्र तत्वसद्भावे विद्यात्मके आरोपयेत् सर्वम् । ततोऽन्येन वक्ष्यमाणेन कलासमूहेन न
पीड्यते ॥²
प्रत्येक भाव में आत्मस्वरूप की व्याप्ति की अनुभूति के साधन—योगी को चाहिए
कि वह प्रत्येक प्रमेय (ज्ञेय) विषय का विश्लेषण करके (पर्यालोचना करके) ज्ञेय विषय
के साक्षात्कार की तीनों कोटियों—आदिकोटि, मध्य कोटि एवं अन्त कोटि—(ग्रहणेच्छा
काल, ग्रहण काल एवं विश्रान्ति काल) के स्तरों पर अपनी स्वरूपावस्था में अवस्थित
रहे । वह ऐसा करके भावना की शक्ति के द्वारा प्रत्येक विषय को एक ही तत्त्व के सद्भाव
पर (स्पन्दसत्ता पर) अभिन्न रक्खे । ऐसा करने से साधक को कलासमूह की पीड़ा का
शिकार नहीं होना पड़ेगा ।
भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं³—प्रबुद्धः =
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दविवृति' ।
२-३. भट्टकल्लट—'स्पन्दकारिकावृत्ति' ।