स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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तब वह स्वयं ही (सहज ही) स्वभावभूत स्पन्द तत्त्व की अनुभूति कर लेता है।
(२) किसी भी पदार्थ के विषय में पूर्ण जानकारी पाने हेतु दिदृक्षु, जिज्ञासु एवं
अनुसंधित्सु को उस पदार्थ में स्वयं ही स्वस्वरूप के साथ प्रविष्ट हो जाना चाहिए तथा
सभी पदार्थों में एक ही स्पन्दतत्त्व की व्यापकता को देख सकने या अनुभव कर सकने
की क्षमता का विकास करना चाहिए। तभी वह प्रमेयों का यथार्थ प्रमाता बन पायेगा और
उसका तद्विषयक ज्ञान 'प्रमा' बन पायेगा।
सारांश यह है कि यदि तुच्छ यौगिक सिद्धियों का त्याग करके योगी विश्वात्मभाव
('अहमिदं' का भाव 'अहं व्याप्तोस्मि सर्वेषु' का भाव) को ग्रहण कर ले तो प्रकृति,
महामाया एवं दैवी शक्तियों के समस्त रहस्य अपने आप उद्घाटित हो जाते हैं।
शैवदर्शन का आभास-प्रक्रिया—'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' के ज्ञानाधिकार में इसका
सविस्तार विवेचन किया गया है। किसी भी भाव के साक्षात्कार हेतु आभासद्वय की
भूमिकायें हैं जो निम्न हैं—(१) 'सविकल्पक आभास' (२) 'निर्विकल्पक आभास'।
(क) इन्द्रिय एवं भाव का संयोग होने पर प्राथमिक क्षण के 'आभास' जो कि
विकल्पों से रहित होते हैं = विकल्पशून्य आभास।
(ख) इन्द्रिय एवं भाव का संयोग होने पर आने वाले अगले क्षण जो कि
विकल्प-सहित होते हैं = सविकल्पक आभास ॥
'निर्विकल्पक आभास' विद्युतवत तीव्र गति से कौंध जाता है। इसमें सामान्य
स्वरूपसत्ता ही वर्तमान रहती है। इसमें जाति, गुण क्रिया आदि अभीष्ट विशेषताएँ
परिलक्षित नहीं होतीं। इसे ही 'निर्विकल्पाभास' 'स्वलक्षणाभास' 'निर्विकल्पाभास' एवं
'स्वरूपाभास' कहा जाता है।
सविकल्पक आभास में अनेक आभासों का मिश्रण होता है। 'निर्विकल्पक
आभास' यथा 'घट' नामक भाव गोलार्द्ध, चौड़ाई, लम्बाई, वर्ण आदि विकल्प से शून्य
है। (सामान्य रूप) ॥ 'सविकल्पक आभास' यथा 'घट' नामक भाव गोलार्ध, चौड़ाई,
लम्बाई, व्यास, वर्ण आदि से युक्त हैं। प्रथमाभास के ठीक परवर्ती आने वाला आभास
सविकल्पक है। भेद पूर्ण आभासों की सर्जना इसकी विशेषता है।
निर्विकल्पक आभास = समस्त भाव सामान्य स्पन्द है। इसकी संवेदना विशुद्ध
अहंरूपात्मक है।
सविकल्पक आभास के भाव काल, आकार, स्वरूप एवं देश के आधारों पर
भिन्नता रखते हैं। यह संवेदना 'इदंरूप' है। समस्त प्रमेय जगत् अधिकांशतः इसी से
सम्बद्ध है।
जागतिक व्यवहारों के लिए सविकल्पक आभास आवश्यक है। जगत् भेदों,
वैचित्र्यों और भिन्नताओं पर आश्रित हैं। मित सिद्धियाँ भी सविकल्पक आभास हैं।
प्रथमाभास विश्व के प्रत्येक अणु में चिद्रूप आत्मस्वरूप की अभिव्यक्ति का
संकेतक है। ये इन्द्रिय बोध गम्य नहीं है। अतीन्द्रिय बोध एवं प्रातिमज्ञान योगियों में