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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 439 of 519

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Page 439

३३८ स्पन्दकारिका
इस 'उन्मेष' का अनुशीलन करने के ही समय में भ्रूमध्य में तेजोबिन्दु का अनुभव
होने लगता है । बिन्दु के पश्चात् अनाहत-अकृत्रिम नाद की अनुभूति होती है । इसे ही
'शब्दब्रह्म' कहते हैं । दूर से श्रवण की सिद्धि भी हो जाती है । अंधकार में रूप का
दर्शन, देवता का दर्शन, सूक्ष्मातिसूक्ष्म का दर्शन, मुख में अमृत और षड्रस का
आस्वादन आदि भी अनुभव में आते हैं । ये क्षोभक हैं? अर्थात् आत्मसंवित् की
अनुभूति में विघ्न है । पंतजलि ने योगदर्शन में व्युत्थान काल में उत्पन्न सिद्धि को
समाधि में विघ्न माना है ।
इस कारिका में प्रोक्त बिन्दु-नाद आदि का निरूपण सृष्टि-क्रम को भी ध्वनित
करता है । 'उन्मेष' से सृष्टि होती है । उन्मेष से पूर्व बिन्दु (इच्छा = दृक् शक्ति का
प्रसार) फिर शब्दात्मक नाद की उत्पत्ति होती है । वह क्रियाशक्ति रूपवाक् है । इसके
अनन्तर रूप का उदय होता है । वह है पदार्थ का दर्शन एवं विचार । फिर उसी में इस
अर्थात् अभिलाषा और उपभोग का जन्म होता है । जो रहस्यवेदी अनुभवी महापुरुष हैं वे
इनको 'उद्योग', 'अवभास', 'चर्वण' और 'विलापन' कहते हैं । इससे स्वयं आत्म-
संवित् का साक्षात्कार हो जाता है ।१ 'नाद' शब्दात्मक, वागाख्य एवं क्रियाशक्तिरूप
है । आत्मसाक्षात्कार कैसे होता है? इसका उपाय निम्नांकित है—
दिदृक्षयेव सर्वार्थान् यदा व्याप्यावतिष्ठते ।
तदा किं बहुनोक्तेन स्वयमेवावभोत्स्यते ॥ ४३ ॥
सारांश—इस कारिका में, प्राप्त होने वाली सिद्धियों से योगियों को सावधान
किया गया है क्योंकि ये सिद्धियाँ उपलब्धियाँ नहीं प्रत्युत् विघ्नपरम्परायें हैं ।२
योगदर्शन में भी इन्हें उपसर्ग कहा गया है—
'ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ॥ (पा०यो०सूत्र ३.३७)
स्पन्दात्मक शाक्त भूमिका की अनुभूति प्राप्त करना या शिवत्व या 'प्रत्यभिज्ञा'
ही साध्य है—न कि निम्नकोटिक सिद्धियाँ ॥
उन्मेष से उपलक्ष्यमाण प्रलीयमान स्थूल सूक्ष्मादिक देहाहंभाव वाले योगी को शीघ्र
ही भ्रूमध्य आदि में तारक का प्रकाश रूप 'बिन्दु' (अशेष वेद्य सामान्य प्रकाशात्मा
बिन्दु), 'नाद' (सकल वाचक अविभेदशब्दनरूप अनाहत ध्वनि रूप नाद), 'रूप'—
अंधकार में भी प्रकाशक तेज 'रस'—रसनाग्र पर लोकोत्तर आस्वाद की प्राप्ति होती है ।
किन्तु ये सिद्धियाँ क्षोभक हैं और विघ्न हैं—
'ते क्षोभकत्वेन स्पन्दतत्त्वसमासादनविघ्नभूतसंतोषप्रदत्वेन वर्तन्ते ।।' यदाहुः—'ते
समाधातुपसर्गौ व्युत्थाने सिद्धयः ।।' (पातं०सू० ३।३७)
इस प्रकार उन्मेष निभालन (उन्मेष का अन्तरावलोकन) में उद्यत योगी के लिए भी
देहात्माभिमानी के लिए बिन्दु एवं नाद की उक्त सिद्धियाँ मात्र विघ्न हैं । जो योगी अपनी
देह प्रमातृत्ता का उन्मेष के यथार्थ स्वरूप में विलय कर देता है वह सशरीरी होने पर भी
१. स्पन्दप्रदीपिका । २. स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य)।