स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in context३२२ स्पन्दकारिका
(२) 'तथा तेनैव प्रयत्नविशेषेण यत् वस्तु येन रूपेण यदा यस्मिन् काले, यत्र
देशे, यथा, येनाकारेण संस्थितं, तद् वस्तु तथा तद्बलं स्वस्वरूपमाश्रि-
तस्याचिरेणैव कालेन प्रतिभाति निरावरणस्वरूपत्वात् तेनातीतागतं ज्ञानं परि-
मितविषयं न किञ्चिदाश्चर्यम्' ।। ३७ ।।¹
शैव दर्शन के अनुसार—
(१) ज्ञानेन्द्रियों द्वारा अत्यन्त अस्पृष्ट, अदृष्ट, अश्रुत एवं अज्ञात दूरस्थ वस्तुओं
को देख न पाने पर दिदृक्षा की तीव्रोत्कण्ठा होने पर दिदृक्षु प्रमाता की बहिर्मुखी प्रवाहित
स्पन्द धारा अकस्मात अन्तर्मुखी होकर अपने मूल केन्द्र (सामान्य स्पन्द प्रवाह) में लय
हो जाती है और इसी कारण एकाग्रता की तीव्रता उपबृंहित हो जाने के कारण वह वस्तु
अत्यन्त दूरस्थ होने पर भी अत्यन्त सुस्पष्टता के साथ दृष्टिगत होने लगती है।
(२) स्पन्दशक्ति की गतिशीलता आन्तरिक रूप में सदैव चलती रहती है किन्तु
प्राणी इसे जानते नहीं। इस गुप्त रहस्य को गुरु की अनुकम्पा से शिष्य जान लेता है।
योगी तीव्र विमर्शात्मक गवेषणा एवं विशिष्ट गम्भीर प्रयत्नों के द्वारा अन्तरालानुगत
संवित् संस्पर्शों को पकड़कर उन पर स्थिर रह सकने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं। इन
योगियों की सङ्कल्प शक्ति इतनी तीव्र होती है कि स्वल्प संवेदनात्मक एकाग्रता आने पर
भी उसके द्वारा वह भूत एवं भविष्य तथा दूर से दूर वर्तमान वस्तुओं को प्रत्यक्षीकृत कर
लेता है।
स्पन्दात्मक आत्मबल की शक्ति—
दुर्बलोऽपि तदाक्रम्य यतः कार्ये प्रवर्तते ।
आच्छादयेद् बुभुक्षां च तथा योऽतिबुभुक्षितः ॥ ३८ ॥
जिस प्रकार निर्बलशरीरी व्यक्ति भी आत्मबल को प्राप्त करके (कठिनतम कार्यों
को भी) निष्पादित कर डालता है और अत्यन्त क्षुधातुर रहने पर भी अपनी क्षुधा को
निवृत्त कर लेता है (उसी प्रकार एक सिद्ध योगी भी अत्यधिक दुर्बल रहने पर भी
स्पन्दात्मक आत्मबल प्राप्त करके दुष्कर से दुष्कर कार्य को भी निष्पादित कर डालता है
और अत्यधिक क्षुधातुर होने पर भी यथाकांक्ष अवधिपर्यन्त अपनी क्षुधा को नियन्त्रण में
रख लेता है ।) ॥ ३८ ॥
- सरोजिनी *
सामान्य व्यक्ति की शक्ति 'उद्योग बल' है और योगी की शक्ति 'स्पन्दात्मक
आत्मबल' है। विशेष परिस्थितियों में जो विलक्षण या असाधारण कार्य अकस्मात्
निष्पादित हो जाते हैं उन्हें 'आवेश' या 'भावावेश' भी कहा जाता है किन्तु यह भावावेश
है क्या? आत्मबल का संस्पर्श मात्र ही तो यह है।
दुर्बल व्यक्ति भी उस शक्ति को प्राप्त करके किसी कार्य में प्रवृत्त हो जाता है एवं
बुभुक्षित व्यक्ति भी उस बल (संयम बल) से अपनी बुभुक्षा का शमन कर लेता है।²
१. भट्टकल्लट । २. स्पन्दनिर्णय ।