स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in context३१६ स्पन्दकारिका
जाग्रत एवं स्वप्न में स्वातन्त्र के लक्षण से उपहित है । यदि पूर्वोक्त रीति से धाता सदैव
आराधित नहीं हो पाता तो अपने आन्तर स्वरूप की अभिव्यक्ति का अभाव होने के कारण
यह योगी जाग्रत एवं स्वप्न दोनों अवस्थाओं में सदैव एक अति सामान्य लौकिक व्यक्ति
की भाँति ही होगा और परमात्मा की उस सृष्टि से अधिशासित रहेगा जो कि विश्व की
सामान्य एवं विशिष्ट वस्तुओं के प्रकटीकरण एवं निश्चयीकरण के कार्य में निरत रहती
है ।१ अर्थ यह है कि यह सृष्टि योगी को भी अति प्राकृत व्यक्ति की भाँति फेंक देगी—
सांसारिक जीवन के गर्त में । भगवान् की सृष्टि स्वप्न-जागरादि पद के प्रकाशन से
स्वातन्त्र्यस्वभावा है । इस प्रकार स्वप्न एवं स्वप्न-शून्य स्थिति के उन्मूलन की विवेचना
एवं स्पष्टीकरण करने के उपरान्त ग्रन्थकार यह विवेचन करना चाहता है कि पूर्ण प्रबुद्ध
व्यक्ति स्पन्द तत्त्व में समावेश पाता है । इसी साधन से ज्ञेय पदार्थों का ज्ञान भी होता है ।२
स्वरूप स्थिति न होने पर चित्त की चंचलता के कारण इच्छारूप स्वप्नादि सृष्टि
स्वतन्त्र हो जाएगी । यहाँ स्वतन्त्र होने का अर्थ है—असमञ्जस-असंगत ही दिखाई पड़ना
क्योंकि सृष्टि का स्वभाव ही ऐसा है । तत्त्व का स्वभाव ही है—इच्छाओं का प्रसार ।
जैसे पुरुष की इच्छायें जाग्रत एवं स्वप्न दोनों में ही स्वतन्त्र चलती रहती हैं—वे
अज्ञानजन्य नहीं हैं—संविद् का स्वमत ही है और वे सहस्रों होती हैं—उनका स्वरूप
है—सम्बद्ध एवं असम्बद्ध विकल्प, किन्तु ज्ञानी की स्वाधीन होती है और अज्ञानी की
उच्छृंखला३ । प्राणी स्वप्न में भी अपने अभीष्ट पदार्थों को ही देखता है अन्य को नहीं ।
‘स्वप्नेऽप्यभीष्टार्थानिव पश्यति ॥'
इस प्रकार के समाधि व्युत्थान मात्र से योगी एवं सांसारिक प्राणी एक समान
दृष्टिगोचर होने लगते हैं । नित्ययुक्तता के दृढ़ीकरणार्थ कारिकाकार ‘अन्यथा तु स्वतन्त्रा
स्यात्' वाली कारिका कह रहा है ।
अन्यथा तु = उक्त प्रकार के विपरीत अन्य प्रकार से । सर्वकर्ता, स्वतन्त्र एवं अद्वैत
परमेश्वर की—ममैवेदं जगत्कार्यम्—(‘यह समस्त जगत् मेरा ही कार्य है') इस प्रकार
की प्रतिपत्ति के अभाव के कारण योगी के 'जागृति एवं स्वप्न पद' दोनों तद्धर्मक होने के
कारण, सर्वगुणात्मकता के कारण, नानाभावविनिर्मिति रूपा सृष्टि हुआ करती है ।
आत्मसंवित् से आविर्भूत होने के कारण स्वातन्त्र्यशक्ति या तदुत्पन्न नियति (सृष्टि)
स्वतन्त्र हैं । जब तक कि साधक अपने को स्वतन्त्रकर्ता, सर्वप्रभु, विभु एवं आत्मस्वरूप
मानकर सृष्टि को अपनी शक्ति समझकर उसका परामर्शन नहीं करता तब तक यह इस
प्रकार अपरामृश्यमाना होने के कारण विचित्र विभ्र उत्पन्न करने में समर्थ रहती है तथा
दुर्निवार रूप में उस सामर्थ्य का विस्तार करती रहती है ।
लौकिकस्येवं—सांसारिक प्राणियों की भाँति ।
सारांश यह है कि—जागरावस्था एवं स्वप्नावस्था दोनों सर्गस्वभावा हैं । वहाँ
ज्ञानज्ञेयभाव से पारमेश्वरी शक्ति की ही स्थिति प्रतिपादित की गई है । उस इस द्वयात्मक
१-२. स्पन्दनिर्णय । ३. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।