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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 414 of 519

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Page 414

तृतीयः निष्यन्दः ३१३
भट्टकल्लट की व्याख्या—यथा = जिस प्रकार की । इच्छा = अभिलाषा होती
है । सोमसूर्योदय = आँख । यदि किसी भी व्यक्ति को आँख एवं अन्य ज्ञानेन्द्रिय के
ग्राह्य विषयों में से किसी भी आकांक्षित विषय का साक्षात्कार करने की इच्छा होती है तो
उसकी उसी ज्ञानेन्द्रिय में उसके अनुकूल ग्रहण शक्ति का आविर्भाव होता है । 'सोमसूर्य'
= (भट्टकल्लट) = आँख । आँख सभी ज्ञानेन्द्रियों का उपलक्षण है अतः यहाँ सभी के
ज्ञानेन्द्रियाँ के प्रतीक के रूप में उल्लिखित हैं ।
स्पष्टीकरण—'सोमसूर्योदयं कृत्वा' 'मध्ये' 'यथेच्छाभ्यार्थितो' आदि शब्दों की
व्याख्या आवश्यक है । 'सोमसूर्योदयं कृत्वा' = (१) भट्टकल्लट 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में
इसकी व्याख्या 'सोमसूर्योदयं कृत्वा चक्षुरादिष्ववधानेन' के रूप में करते हैं । सोमसूर्य =
दोनों नेत्र ॥
(२) भट्टकल्लट ने नेत्रेन्द्रिय (सोमसूर्य) को अन्य ज्ञानेन्द्रियों (श्रवणेन्द्रिय,
त्वगेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय) का उपलक्षण (बोधक) मानकर यह सूचित करने का
प्रयास किया है कि धाता (चित् शक्ति, आत्मा) योगियों के हृदय में इच्छा के रूप में
स्थित (अर्थात् अव्यक्त इच्छा के रूप में आकांक्षित) पदार्थों को उनकी आकांक्षाओं से
सम्बंधित समस्त ज्ञानेन्द्रियों में तदनुकूल अवधानात्मक शक्ति का उदय करके (योगियों)
की आकांक्षाओं की पूर्ति कर देता है यथा—
(१) सुश्रूषा होने पर—विश्व के किसी भी दूर से दूर स्थित शब्द को सुनने हेतु
श्रवणेन्द्रिय में तदनुकूल तीव्रावधान शक्ति ।
(२) दिदृक्षा होने पर—विश्व के किसी भी दूर से दूर स्थित पदार्थ के देखने हेतु
चक्षुरेन्द्रिय में तदनुकूल तीव्रावधान शक्ति ।
(३) घ्राणेच्छा होने पर—विश्व के किसी भी दूर से दूर स्थित सुगंधों एवं सुगंधित
पदार्थों की सुगंधों को प्राप्त करने हेतु घ्राणेन्द्रिय में तदनुकूल तीव्रावधान शक्ति ।
(४) स्पर्शेच्छा होने पर—विश्व के किसी भी दूर से दूर स्थित पदार्थों के स्पर्शों
को प्राप्त करने हेतु त्वगेन्द्रिय में तदनुकूल तीव्रावधानशक्ति ।
(५) स्वादेच्छा होने पर—विश्व के किसी भी दूर से दूर स्थित पदार्थों के स्वाद
ग्रहण करने हेतु रसनेन्द्रिय में तदनुकूल तीव्रावधान शक्ति उत्पन्न कर देता है ।
इसे ही योगशास्त्र में पञ्चतन्मात्र साधना की सिद्धि कहा जाता है । शब्द संवित्,
स्पर्श संवित्, रूप संवित्, रस संवित् एवं गंध संवित् की साधना में सिद्धि होने पर
योगियों में इन विषयों की संवेदना बिना पदार्थों की उपस्थिति के भी हो जाती है ।
यथा—इत्र न होने पर इत्र-गंध, स्वादिष्ट पदार्थ न होने पर भी जीभ में उसका स्वाद आने
लगना आदि-आदि ।
भट्टकल्लट कहते हैं—'नटमल्लप्रेक्षादिषु सोमसूर्योदयं कृत्वा चक्षुरादिष्ववधानेन' ।
नटमल्ल = भाव यह है कि गणिका, नट, मल्ल, दर्शक आदि सभी के अपने समक्ष
विद्यमान रहने पर भी द्रष्टा जिसे देखना चाहता है उसी में स्वरूप का अनुप्रवेश होता है ।