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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 411 of 519

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Page 411

३१० स्पन्दकारिका
देहाद्यहन्ताजनित अनवच्छिन्न स्वमाहात्म्य का निरोध ही 'तम' है उसके द्वारा जो
'वरण' अर्थात् स्थगन (स्वभाव-तिरोधान) होता है उसका निर्भेद (अनन्त निज वैभवाभि-
व्यक्ति के कारण विनाश) है वही उस अवस्था में आविर्भूत होता है । इसी को वृत्ति में
कहा गया है—(१) 'यथा अस्य अनभिव्यक्तस्वस्वरूपस्य', (२) 'स्वप्नेऽप्यभीष्टार्थानैव
पश्यति' ।
'अयमेवोदयस्तस्य' 'इयमेवामृतप्राप्ति' वाली कारिका में—संवित्त्व की उपलब्धि
हेतु उत्तम विधि संस्कारों को कारण के रूप में प्रतिपादित किया गया था किन्तु प्रस्तुत
श्लोक द्वय में संसारी प्राणियों के व्यवहार-निदर्शन द्वारा सिद्धयन्तर कारणत्व का
प्रतिपादन किया गया है ।१
धाता = चित् शक्ति । देहिनः = जिसका स्वस्वरूप अभिव्यक्त नहीं हो पाया है
ऐसा योगी = 'अनभिव्यक्तस्वरूप योगी' ।। अभ्यर्थित = अभ्यर्थना का विषय बना हुआ ।
याचित । अभ्यर्थना = आन्तरिक इच्छा । योगी की आन्तरिक संकल्पात्मक वृत्ति । योगी
की संकल्पात्मक इच्छा । इसे ही 'दिदृक्षारूपा अभ्यर्थना' भी कहा जाता है । सोमसूर्य =
नेत्र द्वय । 'नेत्र' अन्य इन्द्रियों का भी उपलक्षक है—प्रतीक है—वाचक है । योगी जिस
भी इन्द्रिय के विषयों का साक्षात्कार करना चाहता है तो धाता (स्पन्द, चिति शक्ति,
आत्मा) उस-उस इन्द्रिय में विशिष्ट अवधानात्मक शक्ति को उदित कर देता है ।
कारिका ३४ में भट्टकल्लट ने 'स्वप्न स्वातन्त्र्य, का उल्लेख किया है । कल्लट
कहते हैं कि—ऐसे योगी के 'मध्य' (सुषुम्णा) में निरन्तर, प्रतिक्षण 'हृदय' (चित् शक्ति)
की अनुभूति स्पष्टतर रूप में प्राप्त होती रहती है । इसी अवस्था का नाम 'स्वप्न
स्वातन्त्र्य' है क्योंकि एक सिद्ध योगी स्वप्नावस्था में अपने समस्त 'आकांक्षित पदार्थों
का साक्षात्कार कर लेता है । उसकी आकांक्षा को धाता कभी उपेक्षित नहीं कर सकता ।
सोमसूर्य तीव्रतम अवधानात्मक शक्ति का नाम है । (कल्लट)२
इस तीव्रतम अवधानात्मक शक्ति के विकास का परिणाम—नटों, मल्लों के
आकर्षक प्रदर्शनों के सामने रहने पर भी आकांक्षित पदार्थों के स्वरूप में ही आवेश तथा
आकर्षक से आकर्षक दृश्यों, स्थानों, पदार्थों से अप्रभावित रहने की शक्ति का
आयत्तीकरण ।। अर्थात् तीव्र एकाग्रता ।
स्वप्न स्वातन्त्र्य का अधिकारी = मध्यनाड़ी में प्राणापान का लय किए हुए सिद्ध
योगी । भट्टकल्लट कहते हैं—
'यथास्थानाभिव्यक्तस्वरूपस्य योगिनो जाग्रदवस्थायां यथा-यथा इच्छा भवति, तथैव
तस्यानेकार्थ संनिधानेऽभिमतस्यैव कस्यचिदर्थस्य दर्शनं भवति नटमल्लप्रेक्षादिषु सोम-
सूर्योदयं कृत्वा चक्षुरादिष्ववधानेन ।। ३३ ।।'—(भट्टकल्लट)३
१. रामकण्ठाचार्यः 'स्पन्दविवृति' ।
२. भट्टकल्लट—'सोमसूर्य' = ज्ञानेन्द्रियों में आकांक्षित पदार्थों के प्रति तीव्रतम
अवधानात्मक शक्ति उदय = विकास । प्रकटीकरण ।
३. 'स्पन्दसर्वस्व' ।