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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 408 of 519

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Page 408

तृतीयः निष्यन्दः ३०७
इस योगी को स्वप्न एवं सुषुप्ति किसी भी दशा में जड़ता (Insentiency :
चैतन्य-राहित्य) के वशीभूत नहीं होना पड़ता । (यहाँ 'स्वप्न' के द्वारा 'सौषुप्त' भी
उपलक्षित है ।) योगी को स्वप्न एवं सुषुप्ति में भी व्यामोह नहीं होता ।
इस उपर्युक्त प्रसंग में अभीष्टार्थ के प्रकाशन में नित्य प्रार्थनासंवलित एवं भगवतो-
न्मुखी प्रवृत्ति ही उपाय है । परमात्मा देवी आराधना (Divine propitiation) की
उपेक्षा कभी नहीं करता । परमात्मा की प्राप्ति का साधन क्या है? अन्तर्मुख स्वरूप का
परिशीलन (Devotional meditation on internal nature) अन्तःस्वभाव का
भक्तिसंवलित ध्यान ॥
'परमेश्वरो हि चिदात्मा यद्यन्तर्मुखोचितसेवाक्रमेण अर्थ्यते तत्तत्संपादयत एव ॥'
(चैतन्य का स्वामी परमात्मा वे सारे अभीष्ट प्रदान करता है जो उससे माँगे जाते हैं
किन्तु यह तभी देता है जब कि अन्तर्मुखी सेवा की जाय) ।
यदि योगी इस प्रकार एकाग्रचित्त नहीं है तो वह 'योगी' नाम धारण नहीं कर
सकता । 'यदि पुनरेवं सावधानो न भवति तदा नास्य योगिता' । अतः योगी के लिए
सावधानी अत्यावश्यक है । आचार्य उत्पलदेव इन कारिकाओं के प्रारंभ में कहते हैं—
'स्पन्दतत्त्वोदयं प्रोच्याकृत्रिमं तत् एव च ।
मन्त्रोदयं च तद्वीर्यं तद्विभूतीरथाऽऽह तु ॥'
भाव यह कि अकृत्रिम स्पन्दतत्त्व के उदय का वर्णन करके अब उसीसे मन्त्रोदय,
उसका प्रभाव और उसकी विभूतियों का वर्णन किया जा रहा है । स्पन्दतत्त्व का उदय
होने पर जाग्रतावस्था में ही निजभाव की प्राप्ति होने पर 'स्वातन्त्र्य' प्राप्त हो जाता है ।
वैसा ही स्वप्न में भी होता है । इसी दृष्टि को उपबृंहित करते हुए कारिकाककार ने
तैंतीसवीं एवं चौंतीसवीं कारिकायें कही हैं ।
ये दोनों कारिकायें 'विभूतिस्पन्द' की प्रथम एवं द्वितीय कारिकायें हैं । उत्पल-
देवाचार्य कहते हैं—जैसे आत्मस्वभाव रूप स्रष्टा जाग्रत अवस्था में अपनी इच्छा से ही
प्रेरित होकर हृदयदेश में स्थित अभिमत अर्थ का सम्पादन करता है । यह सम्पादन
स्वबल के श्राश्रय से किया जाता है । प्रश्न उठता है यह कैसे? सोम-सूर्य, अपान एवं
प्राण तथा नेत्रों को उदित करके अवधानपूर्वक इच्छित पदार्थ को ही देखता है । अभिप्राय
यह है कि मनुष्य के सामने असंख्य वस्तुएँ रहती हैं—गणिका, नट, मल्ल, दर्शक
आदि । उनमें से वह जिस वस्तु को देखना चाहता है उसी को देखता है क्योंकि उसी में
स्वरूप का अनुप्रवेश होता है । ठीक इसी प्रकार स्वप्नावस्था में भी अपने स्वभाव में
स्थित रहकर हृदय में अभीष्ट पदार्थों को ही स्पष्ट करके देखता है क्योंकि आत्मसंवित्
इच्छा का अतिक्रमण नहीं करती । प्राचीन कथन है—'दृढ़ अभीष्ट विषयक इच्छा को
छोड़कर दूसरी वृत्ति नहीं होती ।'—'मुक्त्वा दृढामभीष्टेच्छां नाऽन्यवृत्तिर्यदा भवेत् ॥'
यह कहना चाहते हैं कि इच्छानुगामी ही पदार्थ सृष्टि में होता है, स्वतन्त्र रूप से
किसी पदार्थ का उदय नहीं होता । पदार्थ इच्छा का अतिक्रमण नहीं करता ।
'रहस्यस्तोत्र' में कहा गया है कि—बुद्धि विस्मृत पदार्थ का स्मरण करके