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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 398 of 519

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Page 398

द्वितीयः निष्यन्दः २९७
के मत में) के द्वारा होता है। निष्कर्ष यह कि वह संवेदन जो कि ध्याता को 'ध्यान' तक
पहुँचा दे उसी ध्यानलीन संवेदन के द्वारा देव-साक्षात्कार होता है।
(४) देव साक्षात्कार (देवता का उदय) कहते किसे हैं? क्या एकाग्रता की अवस्था
में अपने चित्त-कल्पित देवाकार का क्षणिक अवभास या झलक ही देव साक्षात्कार
है?—नहीं। इसीलिए कारिकाकार का कथन है कि कल्पनाप्रसूत आकार का साक्षात्कार
देव-दर्शन नहीं है प्रत्युत् देव दर्शन तो वह है जिसमें निम्न लक्षण हों—
(१) ध्यानयोगी के चित्त में ध्यान का विषयीभूत ('ध्येय') देवता ही दिखाई दे
अन्य आकार नहीं। कभी-कभी चित्त की एकाग्रता में जिसका ध्यान न किया जाय उसका
दर्शन देव-साक्षात्कार की कोटि में नहीं आता क्योंकि संभव है कि वे विघ्न हों—चित्त
विकृति के परिणाम हों या निर्बल चित्त की कल्पना हों।
(२) इस ध्यान की स्थिति में ध्याता साधक की ध्येयाकाराकारिताचित्तवृत्ति भी हो।
इसे ही 'तदात्मता समापत्ति' कहा गया है। यह कल्लट ने इसे 'तत्स्वभावत्वप्राप्ति'
कहा है।
(३) कारिकाकार का कथन है कि यह 'तदात्मतासमापत्ति' साधक द्वारा इच्छा
करते ही प्राप्त हो जाती है। भट्टकल्लट का कथन है कि इच्छा सामान्य इच्छा नहीं
प्रत्युत् यह वह इच्छा जो कि मन्त्रप्राणात्मिका हो—'मन्त्रात्मनः साधक चेतसि तादात्म्यं
तत्स्वभावत्वप्राप्तिः मन्त्रदेवतया सह साधकस्य मन्त्रोच्चारणेच्छया संपादिता ॥'
ध्येय का उदय—(क) साधक 'मन्त्रात्मा' हो (ख) जो मन्त्र जपा जाय उसी देवता
का ध्यान किया जाय तथा जिस देवता का ध्यान किया जाय उसी का 'मन्त्र' जपा
जाय—मन्त्रदेवतया सह । 'मन्त्रोच्चारणेन'। उसी मन्त्र की एवं उस मन्त्र के देवता के
दर्शन की इच्छा करते हुए तदात्मक मन्त्र जपा जाय—'मन्त्रोच्चारणेच्छया'। ऐसा न हो
कि 'मन्त्र' किसी अन्य 'देवता' का हो। ध्यान किसी अन्य देवता का हो तथा 'इच्छा'
कहीं अन्यत्र टिकी हो। यदि ऐसा हुआ तो ऐसी स्थिति में भी 'देवोदय' संभव नहीं है।
योगसूत्र में भी कहा गया है—'तज्जपस्तदर्थभावनम्' (यो०सू०)।
(४) प्रश्न उठता है कि यदि 'ध्याता' ध्येय के 'मन्त्र' का ही जप भी कर रहा हो,
उसी का 'ध्यान' भी कर रहा हो तथा उसी ध्येय के दर्शन की 'इच्छा' भी कर रहा हो तो
क्या इस स्थिति को या इस स्थिति में होने वाले विकल्पात्मिका अनुभूतियों को 'देवोदय'
(देवसाक्षात्कार) कहेंगे?
तदात्मता समापत्ति—कारिकाकार कहते हैं कि यह भी देवोदय नहीं है। देवोदय
(देव दर्शन, देवसाक्षात्कार) अपने अहं को मिटा देने में है—अस्मिता का ध्येय में लय
कर देने में है—ध्याता-ध्यान-ध्येय की त्रिपुटी के एकाकार करने या होने में है। इसीलिए
कारिकाकार का कथन है कि देवदर्शन 'तदात्मता समापत्ति' है—'तत्स्वभावत्वप्राप्ति'
(भट्ट कल्लट) है।
ध्याता योगी के चित्त में ध्येय (इष्ट देवता) का साक्षात्कार, (इच्छा के उदित होते