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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 392 of 519

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Page 392

द्वितीयः निष्यन्दः २९१
तस्य = उसका ।
ध्येये = ध्यान का विषय ।
ध्यायिचेतसि = ध्याता के चित्त में । १
तदात्मता = तादात्म्यभाव ॥
समापत्ति = समाधि । आत्मसाक्षात्कार ।
(१) यही ध्याता के मस्तिष्क में अभिव्यक्ति है : उदय है : प्रकटीभाव है ॥
(२) यह अभिव्यक्ति ध्येय की अभिव्यक्ति है । २
(३) इस ध्येयाकार अभिव्यक्ति में साधक आत्मा के साथ ऐकात्म्य प्राप्त कर लेता
है—तद्रूप हो जाता है : तादात्म्यभाव प्राप्त कर लेता है । 'शिवो भूत्वा शिवं यजेत्'—के
अनुसार ध्याता के चित्त में—'न सावस्था न या शिवः'—इस प्रकार प्रतिपादित
शिवस्वभाव ध्येय का तथा किसी सिद्धि के लिए किसी विशेष मन्त्र के देवता का यही
'उदय' या प्रकटीभाव है । 'तदात्मता समापत्ति' शिवैक्यावेश है । यह 'न सावस्था न या
शिवः' की अनुभूति है । यह पञ्चवक्त्र (शिव) आदि का साधक के अपने से पृथक् रूप
में अपना स्वरूप प्रदर्शित करना नहीं है—यह देवता का साधक से पृथक् व्यक्तित्व
प्रदर्शन नहीं है—यह साधक से पृथक् होकर उसे दर्शन देना नहीं है 'न तु पञ्चवक्त्रा-
देर्व्यतिरिक्तस्याकारस्य दर्शनं' । ३ यह तदात्मतासमापत्ति की निश्चयात्मिका बुद्धि भी नहीं
है—'न तु निश्चयमात्रेण तदात्मता समापत्तिः' ४ प्रत्युत् यह है—इच्छा करने वाले साधक
का अविकल्प विश्वाहन्तात्मक शिवैक्यरूप इच्छा परामर्श-शिवैक्यावेश । ५ इसी बात को
इस प्रकार भी कहा गया है—'मैं ही तत्संवेदन रूप से तादात्म्यप्रतिपत्ति से विश्वशरीर
चिदानन्दघन शिव हूँ' । ६
—'अहमेव तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितो विश्वशरीरश्चिदानन्दघनः शिव
इति'—इस प्रकार का सङ्कल्प अविकल्प शेषीभूत रूप से फल प्रदान करता हूँ—उसका
ध्येय मन्त्र देवता सभी साधकों के समक्ष अभिमुख होता है । परमेष्ठिपाद द्वारा भी कहा
गया है—
'साक्षाद्भवन्मये नाथ सर्वस्मिन्भुवनान्तरे ।
किं न भक्तिमतां क्षेत्रं मन्त्रः केषां न सिध्यति ॥' (उ०स्तो० १।४)
यही समापत्ति—परमाद्वयरूप अमृत की प्राप्ति है—'इयमेव च समापत्तिः परमा-
द्वयरूपस्य अमृतस्य प्राप्तिः।।'
अन्य अमृत में तो कतिपय काल तक शरीर अमर रहता है किन्तु बाद में साधक
की मृत्यु हो जाती है किन्तु इस अमृतत्व की प्राप्ति में ऐसा नहीं होता । 'स्वच्छन्दतन्त्र'
में भी इसकी पुष्टि की गई है—
(१) नैव चामृतयोगेन कालमृत्युजयो भवेत्,
१-६. स्पन्दनिर्णय ।