स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in context२८८ स्पन्दकारिका
आश्रय नहीं लेती तब तक न तो जीव का उद्धार होता है और न तो यह कुल शक्ति ही
कृतार्थ हो पाती है अतः 'स्वमार्गस्था' का अर्थ है—सुषुम्णा स्थित ब्रह्म नाड़ी में संप्रविष्ट
होकर संस्थित ॥
'मयि स्थितमिदं जगत् सकलमेव सर्वत्र वा ।
स्थितोऽहमिति धारणाद्वितयभावनावेशतः ॥
जगत्त्रितयनाथ तानतिचिरेण सम्प्राप्यते ।
नृभिस्तव सपर्यया दलितकिल्बिषोपप्लवैः ॥'१
गीता में भी कहा गया है—
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
'पंचरात्र' में भी कहा गया है कि 'प्रज्ञा के राजमहल पर आरूढ़ पुरुष अशोच्य
हो जाता है मानों पर्वत के उच्च शिखर पर स्थित पुरुष नीचे की वस्तु को देख
रहे हों ॥'— प्रज्ञा प्रासादमारुह्य अशोच्यः शोचतो जनान् ।
भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति ॥'२
यहाँ नित्य उद्युक्तता एवं उन्मुक्तता को ही उपाय के रूप में ध्वनित किया गया
है—'अत्र च नित्योद्युक्तरूपत्वमेवोपायो युक्त्याध्वनितः ॥' कहा भी गया है—
'अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्व विविक्तये ।
जाग्रदेव निजं भावमचिरेणाधिगच्छति ॥' (२१)३
जीवन्मुक्त कौन है? 'यस्य इति वा संवित्तिः स जीवन्मुक्तः ॥'४
यस्य वा—जिस साधकोत्तम की । संवित्तिः = सम्यक् ज्ञान ॥ सततम् = सभी
अवस्थाओं में व्यवधानरहित होकर अखण्ड रूप में । युक्तः = समाहित । स्वभावबल
परिशीलन अप्रमत्त-एकाग्रमानस साधक । स जीवन = नियत देहाधिकरणों एवं प्राणों को
धारण करता हुआ । मुक्तः = सर्वव्यापक-सर्वात्मक-सर्वेश्वर स्वतन्त्र स्वस्वभावाहंकार
प्रतिपत्ति की दृढ़ता से जन्ममरण के चक्र से मुक्त होकर रहने वाला यह साधक परमेश्वर
ही है । न संशयो = इस विषय में कोई भ्रान्ति नहीं है ।
प्रश्न उठता है कि क्या करता हुआ जीवन्मुक्त? 'अखिलम्' अर्थात् अशेष ।
अनन्त वस्तु व्यक्ति विचित्र इस 'विश्व' या जगत् को 'क्रीडात्वेन'—अर्थात् स्वनिर्मित-
चराचर भावक्रीडनको परचितलीलामात्र के रूप में 'पश्यन्' अर्थात् विभावित करता
हुआ ॥५
अनुन्मिषित स्वस्वभावनिभालनक्षमविमलविज्ञान दृष्टि वाला व्यक्ति अपने को दूसरे
से भिन्न मानकर उसके कारण उत्पन्न हर्ष एवं शोक तथा भय आदि विकारों का
अनुभव करता हुआ आवागमन के चक्र में पड़ा हुआ दुःख भोगता है । किन्तु जो साधक
१. ज्ञानगर्भ । २. पञ्चरात्र ।
३-४. स्पन्दप्रदीपिका । ५.स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य) ।