स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in context२७६ स्पन्दकारिका
'यद्वद् वस्तुस्वभावेन ज्ञानेन विषयीकृतम्।
तद्वत्तादात्म्यमायाति जीवः सर्वमयो ह्यतः॥'
'संवित्प्रकाश' में कहा गया है—अग्नि से समाविष्ट सब अग्निरूप ही दिखता है,
वैसे ही ज्ञान समाविष्ट सब ज्ञानरूप ही देखिए'—
'यथाऽग्निना समाविष्टं सर्वं तद्रूपमीक्ष्यते।
तथा ज्ञानसमाविष्टं सर्वं तद्रूपमीक्ष्यताम्॥'
'आगमरहस्य' में भी कहा गया है—ज्ञान से आकार वर्ग भासित होता है अतः
यह विश्वमयी विभूति ज्ञान ही है। तुम्हीं विश्वात्मक हो, यह केवल शास्त्रसिद्ध ही नहीं
है, आत्मसंवित् से संविदित् होने के कारण अनुभवसिद्ध भी है—
आकार वर्ग उपरि प्रतिभासतेऽस्य,
ज्ञानस्य सापि तव विश्वमयीविभूतिः।
विश्वात्मकस्त्वमिति नाऽऽगमसिद्धमेतत्,
किन्तु स्वसंविदितरूपतयापि सिद्धम्॥
संवित् तत्त्व ही प्राण के माध्यम से वाणी का रूप धारण करता है—'संविदेव
प्राणद्वारेण वायूरूपतां धत्ते॥'
इसीलिए कहा भी गया है—संवित् तत्त्व वाणी का रूप-अर्थात् परा-पश्यन्ती-
मध्यमा एवं वैखरी भी बन जाता है। इन चारों वाणियों का वक्ता निर्विशेष परमस्थायी
और नित्योदित निजाकृति है। सूर्य के समान तेज का विस्तार करता हुआ वह हृदय में
प्रकाशित होता है और चिदिच्छा-शक्ति से संबुद्ध है और आत्मबल ही उसका बल है—
स्थानेषु विवृते वायौ कृतवर्णपरिग्रहा।
वैखरी वाक् प्रयोक्तॄणां प्राणवृत्तिनिबन्धना॥
केवलं बुद्धयुपादानात् क्रमरूपानुपातिनी।
प्राणवृत्तिमतिक्रम्य मध्यमा वाक् प्रवर्तते॥
अविभागात्तु पश्यन्ती सर्वतः संहृतक्रमा।
स्वरूप ज्योतिरेवान्तः सूक्ष्मा वागनपायिनी॥
स्वयं रौति य एषोन्तर्निर्विशेषनवात्मकः।
स परः परमः स्थायी नित्योदित निजाकृतिः॥
चिदिच्छाशक्तिसम्बुद्धः स्पन्द आत्मबलेरितः।
सवितेव स तेजांसि विचिन्वन् हृदि राजते॥
'प्रत्यभिज्ञा' में भी कहा गया है—प्रत्यवमर्शात्मा चिति ही सरस परावाक् है।
परमात्मा का यह स्वातन्त्र्य ही मुख्य ऐश्वर्य है। वह सर्वदेशकाल में स्फुरित होती हुई
सभी का आधार है और परमेश्वर का हृदय है—और उसका रूप है अन्तः संकल्प—
'चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परावाक् स्वरसोदिता।
स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः॥