स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
DevanagariHindipublished519 pages
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Read in contextPage 372द्वितीयः निष्यन्दः २७१
द्वितीयः निष्यन्दः २७१
तत्रैव = स्वस्वभाव, परमकारण शिव में ।
सम्प्रलीयन्ते—सम्यक् रूप से लय हो जाते हैं । उसके साथ एकाकार हो जाते
हैं । एकता प्राप्त कर लेते हैं ।
शिवधर्मिणः = शिव अर्थात् परमेश्वर के अनन्यसाधारण सर्वज्ञत्वादि गुण (धर्म)
वाले अर्थात् शिव से अभिन्न स्वरूप वाले ।
आराधकचित्तेन सह = आराधक के मन के साथ । कैसे चित्त के साथ? उस
अवस्था में अभिसंधि उपाधि से रहित होने के कारण स्वाभाविक मात्रावशेष साधक-चित्त
के साथ ।
इसके द्वारा इसे तात्त्विकमन्त्रवीर्यात्मक प्रतिपादित क्यों किया गया? क्योंकि
मांत्रिक चेतना के उदय एवं अस्तमन की दशाओं की परमकारणस्वरूप शिव के साथ
अभिन्नता है—
'मन्त्रचेतसोः उदयास्तमयदशयोः परमकारणात् शिवाभेदः ॥'
इस प्रकार मन्त्रात्मक एवं साधक के चित्त के साथ एकात्मक होने के कारण स्वयं
शिव एवं शक्ति ही वर्णसंकल्पादिरूपधारिणी होकर प्रकट हो जाती हैं और इस तरह
होकर शिव की शक्ति स्वस्वभावबल का स्पर्श न पाने वाले साधकों में भेदविभ्रम उत्पन्न
करती हुई केवल नियतार्थसाधनाधिकार को ही प्रवर्तित करती है । यथा प्रतिपादित
स्वस्वभाव में ही सुदृढ़ आत्मप्रतिपत्ति हुआ करती है । १
'मन्त्र सर्वार्थसाधनाधिकारी हुआ करते हैं: 'मन्त्राः सर्वार्थसाधनाधिकारिणो भवन्ति'
जो यथाप्रतिपादित स्वस्वभाव में ही सुदृढ़ रूप से आत्मप्रतिपत्ति कर चुके हैं उनके
उदय एवं अस्तमय (अस्तमन) के परिज्ञाता समस्त मन्त्र सर्वार्थसाधनाधिकारी होते हैं
और वे इसके लिए उन-उन कर्तव्यों के साहित्य (एक साथ होना या रहना के नियमादिक
की अपेक्षा भी नहीं रखते )
'मन्त्राः सर्वार्थसाधनाधिकारिणो भवन्ति तत्तदितिकर्तव्यतासाहित्यनियमाद्यपेक्षां
बिना' इस स्थिति में—
मन्त्र विज्ञान—
'यद्यद्वचनं येन येनाभिसंधिना उच्चारयति तत तस्यामोघमन्त्रतामापद्यते ॥'
अतः योगियों के द्वारा, स्वभावबलाक्रमण वाले, सिद्ध एवं स्वतः सिद्ध मन्त्रों के
पराक्रम (सामर्थ्य) प्रत्यवमृष्टव्य हैं ।
मन्त्र शिवधर्मी हैं—'मन्त्रा एव शिवधर्मिणो' ।
जब तक कि कोई 'क्रिया' ज्ञान नहीं बन जाती एवं कोई 'कार्य' ज्ञेय नहीं बन
जाता अर्थात् परतत्त्वाभेदापत्तिलब्धात्मक एवं (इस प्रकार) शिवात्मक नहीं बन जाते तब
तक 'मन्त्र' शिवधर्मी नहीं बन पाते । २
१. स्पन्दकारिकाविवृतिः रामकण्ठाचार्य । २. स्पन्दविवृति (रामकण्ठाचार्य) ।