स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
DevanagariHindipublished519 pages
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द्वितीयः निष्यन्दः २६९
मन्त्रों का चिदाकाश में लय एवं उनकी शिवात्मकता—
तत्रैव सम्प्रलीयन्ते शान्तरूपा निरञ्जनाः ।
सह साधकचित्तेन तेनैते शिवधर्मिणः ॥ २७ ॥
वे शान्त (शुद्ध संवित्) एवं निरञ्जन (मायिक आच्छादनों से शून्य) मन्त्र
(निवृत्ताधिकार होकर) आराधक के चित्त के ही साथ वहीं (स्वस्वभाव व्योम, या
स्पन्दात्मक बल या विशुद्ध चिद्रूप सामान्य स्पन्द रूप शाक्त भूमिका में) लीन हो जाते
हैं । अतः वे (समस्त मन्त्र) शिवस्वरूप (ही) हैं ॥ २७ ॥
- सरोजिनी *
तत्रैव = 'स्वस्वभाव व्योम में' = विशुद्धचिद्रूपता में,
तत्रैव = वहीं (स्पन्दात्मक बल में) ॥ (स्वस्वभाव व्योम में—भट्टकल्लट)
निरञ्जनाः = अञ्जन+शून्य (कृतकृत्य होने के कारण निवृत्तअधिकारमल) ॥ कृतकृत्य =
अपने पदार्थ या लक्ष्य प्राप्त करने पर आत्मतृप्त ॥ (निरञ्जनाः शान्तरूपाः मन्त्राः
स्पन्दात्मके बले सम्यक् अभेदापत्या प्रकर्षेण अपुनरावृत्या लीयन्ते । अधिकार-मलान
मुच्यन्ते आराधकचित्तेन सह ।¹
मन्त्र-विज्ञान—समस्त मन्त्र शिवधर्मी या शिवस्वरूप हैं । 'मन्त्र' अपने मूल रूप
में आत्मा की किरणें हैं—चैतन्य की रश्मियाँ हैं—'मन्त्राश्चिन्मरीचयः' । 'प्रणव' (महा-
मन्त्र) की १२ कलायें हैं । उनमें 'बिन्दु' नाद के रूप में विकसित होता है । नाद ही
'मन्त्र' के रूप में आकार ग्रहण करता है । मन्त्र भी अशुद्धियों से मुक्त हो जाते हैं और
उनके कार्यों की अशुद्धियाँ भी, उनके द्वारा लक्ष्य-प्राप्ति के अनन्तर, लुप्त हो जाती हैं ।
ये मन्त्र एवं उनके स्वामी महेश्वर शिव के स्वभाव वाले हैं—शिवस्वभावी हैं—शिवधर्मी
हैं—और स्पन्दसार हैं । ये स्पन्द से उत्पन्न होते हैं और उसी में लय हो जाते हैं ।²
एक प्रश्न यह उठता है कि—मन्त्र एवं करणों का उदय तो समान स्रोत से होता
हैं—उदय में तो दोनों समधर्मी हैं फिर करण सर्वज्ञात्मक क्यों नहीं हैं? परमेश्वर
'मायाशक्ति' के द्वारा शरीर एवं इन्द्रियों का आविर्भाव करता है और ये भेदपूर्ण हैं—
द्वैतात्मक हैं । परमात्मा 'विद्याशक्ति' के द्वारा आकाश के माध्यम से मन्त्रों को जन्म देता
है । इन मन्त्रों का सार तत्त्व अधिष्ठात्री शक्तियों में निवास किया करता है । मन्त्रों के
द्वारा सर्वज्ञता आदि गुण एवं शक्तियाँ प्राप्त की जाती हैं यह संगत तथ्य है क्योंकि
मायिक धरातल पर भी मन्त्र में (किसी देवी के वाचक के रूप में) शरीर एवं पुर्यष्टक की
भाँति बोध-संकोचत्व (Limitation in knowledge) नहीं है प्रत्युत् उसमें सर्व-
ज्ञत्वादि गुण निहित है ।³
इस पंक्ति की व्याख्या उपर्युक्त विधि से अनन्त भट्टारक के संदर्भ में भी की जानी
चाहिए जो कि विद्यापाद पर स्थित है एवं सृष्टि करते हैं ।
१-३. स्पन्दनिर्णय ।