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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 367 of 519

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Page 367

२६६ स्पन्दकारिका
हैं क्योंकि उस स्थिति में ये आद्यन्त, उत्पन्न एवं विनष्ट एवं अनित्यधर्मा वर्णाक्षर मात्र
रहते हैं। ये मन्त्र— 'तद बलं आक्रम्य सर्वज्ञबलशालिनः' हुआ करते हैं।
उक्त पारमेश्वर शक्ति को पाकर ('उक्त बलाक्रमणेन') ये मन्त्र सुनिश्चित कार्यों या
अभीष्टों को निष्पादित करने में सहायक हो जाते हैं और ये दीक्षादिक के द्वारा वृश्चिक-
विष की अपसारणा से लेकर आकर्षण (स्तंभन, मोहन, वशीकरण, आकर्षण आदि)
पर्यन्त परापर सिद्धियों (अभीष्ट-साधन) के निष्पादनाधिकार में अप्रतिहतशक्ति बन जाते
हैं—'उक्त बलाक्रमणेन तु नियतेतिकर्तव्यतासहाया दीक्षादि वृश्चिकविषाकर्षणान्त परापर
स्वकार्यसंपादनाधिकाराप्रतिहतशक्तयो भवन्ति।'
यदि सभी मन्त्रों में उक्त पारमेश्वर शक्ति के प्राप्ति की पराक्रम-क्षमता समान है तो
फिर इनमें अधिकारों की भिन्नता क्यों है? वे सभी साधनों में अभीष्टार्जन करने में सफल
क्यों नहीं हो पाते? ये मन्त्र किस प्रकार साधकों के नियत अधिकार के लिए प्रवर्तित
होते हैं? ये साधकों के कार्यों में उसी प्रकार सहायक होते हैं जैसे कर्मेन्द्रियाँ एवं
ज्ञानेन्द्रियाँ ('देहिनां करणानिव') ॥
परमेश्वर के द्वारा ही चेतनत्वापादन हेतु उत्पन्न प्रवृत्ति आदि में साम्य होते हुए भी
इन्द्रियाँ अपने लिये प्रकृति द्वारा प्रदत्त शक्ति के बल से शब्दादिक विषयों के प्रकाशन में
समर्थ है—और उनका सामर्थ्य उसी सीमा तक पर्यवसित है।
इन इन्द्रियों का अधिकार पृथक्-पृथक् है। सभी इन्द्रियाँ सभी इन्द्रियों के
अधिकार या सामर्थ्य का उपयोग नहीं कर पातीं (यथा—नेत्रेन्द्रिय देख पाती है किन्तु
सुन नहीं पाती और श्रवणेन्द्रिय सुन पाती है किन्तु देख नहीं पाती आदि-आदि)। उसी
प्रकार ये मन्त्र साधकों के स्वीकृत परस्वभाव एवं अहम्भाव की प्रतिपत्तियों के विषय में
यथा नियताधिकार के क्षेत्र में ही प्रवर्तित होते हैं उसका अतिक्रमण करके नहीं—
मन्त्र विज्ञान—'मन्त्राः साधकानां स्वीकृतपरस्वभावाहंभावप्रतिपत्तीनां यथानियमिता-
धिकाराय प्रवर्तन्ते ॥'—
अतः सर्वज्ञबलशाली होने के बाद भी ये मन्त्र इन्द्रियों की ही भाँति नियताधिकार
मात्र हैं—'तस्मात् करणवत् सर्वज्ञबलशालिनोऽपि मन्त्रा नियताधिकारा एव ॥'¹
'मन्त्र' का स्वरूप, उसका लक्षण एवं उसके प्रभाव के विषय में शास्त्रों ने बहुत
विवेचन किया है निम्नांकित उद्धरण ध्यातव्य हैं—
'मननमयी निजविभवे निजसंकोचे भये त्राणमयी' ॥
(१) कवलितविश्वविकल्पा अनुभूति कापि मन्त्रशब्दार्थः²।
(२) 'मननत्राणधर्माणो मन्त्राः'।
(३) 'वर्णात्मको न मन्त्रो दशभुजदेहो न पंचवदनोऽपि ।³
संकल्पपूर्वकूटौ नादोल्लासो भवेन्मन्त्रः ॥'⁴
१. रामकण्ठाचार्यः 'स्पन्दकारिकाविवृति'। २-४. महार्थमञ्जरी।