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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 34 of 519

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Page 34

परिचय एवं पृष्ठभूमि ३३
संकल्पमात्रमतिमुत्सृज्य निर्विकल्प-
माश्रित्य निश्चयमवाप्नुहि राम शान्तिम् ॥ (४।५८)
भोगापवर्गसाहचर्यवाद—'त्रिकदर्शन' योग एवं भोग, संसार एवं अपवर्ग दोनों में
विश्वास करता है। स्पन्दप्रदीपिकाकार ने पाठकों को यह सूचना देते हुए कि—
'अथ संग्रहग्रन्थकृता समग्रमग्र्य ग्रन्थार्थं गर्भीकृत्य ग्रन्थनिष्पत्यर्थमभिमतदेवतां
स्तोतुं श्लोक उपन्यस्तस्त्यार्थः प्राक् श्लोके ध्वनितोऽपि विततोच्यते—
'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ।
तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शंकरं, स्तुमः।' (स्पन्दकारिकाविवृति) १
अर्थात् 'स्पन्दकारिका' ग्रन्थ की अगली कारिकाओं में या संपूर्ण इस ग्रन्थ में जो
कुछ भी कहा गया है उसका सारांश प्रथम कारिका में दिया जा चुका है—आगे कहते हैं
कि इन पंक्तियों द्वारा युगपदभोगापवर्गसाहचर्यवाद की पुष्टि की गई है क्योंकि 'शंकर
स्तुमः' में 'शंकर' का अर्थ मात्र कल्याण' ही नहीं प्रत्युत् 'भोग' भी है। 'शं' का अर्थ
है श्रेय या सुख। यह सुख 'शं' द्विपक्षीय है—१. भोग, २. अपवर्गः 'भोगापवर्गाख्यं शं
= श्रेयः सुखं वा करोतीति शंकरः ॥' २
'स्पन्दकारिका' के विभूति स्पन्द निष्पन्द में अनेक प्रकार की भोगात्मक सिद्धियों
की ओर संकेत किया गया है तथा स्पन्दशास्त्र का लक्ष्य शक्तिचक्र की ईश्वरता की
प्राप्ति बताया गया है—
यदात्वेकत्र संरूढस्तदा तस्य लयोद्भवौ।
नियच्छन् भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥ (स्पन्द का० २१)
शब्दाद्वैत के निरासपूर्वक 'ईश्वराद्वयवाद' की स्थापना—
उत्पलदेव 'शिवदृष्टिवृत्ति' में कहते हैं—'ईश्वराद्वयवाद एव युक्तियुक्तो न तु
शब्दपरब्रह्माद्वयवाद इति वक्तुं वैयाकरणोपेतशब्दाद्वैतं तावन्निराकर्तुमुपक्रममाण आह—
'अथास्माकं ज्ञानशक्तिर्या सदाशिवरूपता।
वैयाकरणासाधूनां पश्यन्ती सा परा स्थितिः ॥ ('शिवदृष्टि' २ आ०१)
'अद्वयवादस्थितः'। (शिवदृष्टिवृत्तिः (उत्पलदेव) २।१)
सर्वचिन्मयवाद—आचार्य सोमानन्दपाद कहते हैं—
'सर्वभावेषु चिद्व्यक्तेः स्थितैव परमार्थता ॥' (शिवदृष्टिः ४ आ०५)
सारे भाव चित् शक्ति की मात्र अभिव्यक्तियाँ हैं।
आचार्य क्षेमराज 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहते हैं—(१) चिदेव भगवती स्वच्छ-
स्वतन्त्ररूपा तत्तदनन्तजगदात्मना स्फुरति।—इत्येतावत् परमार्थोऽयं कार्यकारणभावः।
(२) चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः ॥ (३) पराशक्तिरूपा चितिः एव भगवती स्वतन्त्रा
१. स्पन्दकारिकाविवृति। २. स्पन्दकारिका (प्रथम कारिका)।
स्पं.भू. २