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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 293 of 519

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Page 293

१९२ स्पन्दकारिका
'यथार्थस्वरूपायाः स्तस्तत्सौषुप्तमुदाहृतम् ॥' (१.१०)
अविवेक (ज्ञान एवं ज्ञेय रूप चित् शक्ति पर चढ़ा हुआ अविद्यावरण) के कारण
प्रमाता की अपनी चिद्रूपता एवं बाह्य रूप में अनन्तावभासन की क्षमता सुषुप्ति में रुक
जाती है ।
सुषुप्ति काल में (ज्ञान-ज्ञेय पर मायीय आवरण पड़ा रहने के कारण) प्राणी की
बाह्यार्थों की ओर उन्मुखता, ऐन्द्रिय बोध एवं उनकी स्मृति कुछ भी संभव नहीं रहती ।
सुषुप्तिगत व्यक्ति की समस्त चेतनाशक्ति, शरीर, प्राण, बुद्धि, इन्द्रिय आदि से
सिमट कर पुर्यष्टक में लीन हो जाती है । पुर्यष्टक में सुषुप्तिकालीन संस्कारों के कारण
व्यक्ति जागृति की अवस्था में आने पर सुषुप्ति के अनुभव 'मैं सुख से सोया' 'मुझे कुछ
भी ज्ञान नहीं है' आदि आदि होते हैं ।
(आ) योगियों की दृष्टि में सुषुप्ति की अवस्था—योगियों की सुषुप्ति
पशुप्रमाताओं की सुषुप्ति के समतुल्य नहीं है । गीताकार कहते हैं—
'या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्तिसंयमी ।
यस्यां जागर्ति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥'
शङ्कराचार्य के लिए निद्रा और समाधि दोनों में भेद नहीं है—वे कहते हैं—'निद्रा
समाधिस्थितिः' योगियों के लिए निद्रा समाधि की स्थिति होती है । समाधि की अवस्था
में बाह्य पदार्थों की ओर उन्मुखता न रहने के कारण सारे प्रमेय एवं सब कुछ स्वस्वरूप
में विश्रान्त रहता है अतः आत्मा तब तक विशुद्ध चिन्मात्र रूप में अवस्थित रहती है ।
समाधि निष्ठ योगी में ग्राहकता एवं ग्राह्यता का भेद नहीं रहता । उसके समस्त भाव
आत्मस्वरूप में विश्रान्त या अवभासित रहते हैं । योगी समाधि की दशा में ज्ञान-क्रिया-
पूर्ण स्पन्दन की पूर्ण चेतना रखता है । योगी की सुषुप्ति पशुओं की सुषुप्ति के समान
मूढ़ता की दशा नहीं है । यहाँ वेदक योगी किसी भी अभाव या शून्यता को अनुभव नहीं
करता । समाधि में अनुभूत आत्मस्वरूप की सत्ता कोई प्रातिभासिक एवं व्यावहारिक नहीं
प्रत्युत् शाश्वतिक एवं पारमार्थिक होती है ।
'अभाव समाधि' एवं 'शून्य समाधि' दोनों जड़ हैं । आत्मानुभूति सतत स्फुरण-
समन्विता होने के कारण नित्यात्मिका होती है । किन्तु पशुभाव में होने वाली अनुभूति
अनित्य होती है ।
'मैं नहीं हूँ' यह अभावात्मक अनुभूति भी किसी भावसत्ता (वेदक) पर ही आधृत
है । यदि भाव (वेदक) की ही सत्ता न रहे तो अभाव ('मैं नहीं हूँ') की स्मृति किसे
होगी? 'शिवसूत्र' (१.१०) में इन्हीं दृष्टियों से योगियों की सुषुप्ति एवं उनकी समाधि
को समतुल्य कहा गया है—
ग्राह्य-ग्राहकभेदासञ्चेतनरूपश्च समाधिः सौषुप्तं, इत्यप्यनया वचोयुक्त्या
दर्शितम् ॥'१
१. शिवसूत्रविमर्शिनी (१.१०) ।