Skip to content
SarvaKosh
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished519 pages

Page 290 of 519

Read in context
Page 290

प्रथमः निष्यन्दः १८९
'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।' (गीता)
अभावसमाधि—के उपदेष्टा कहते हैं कि 'मैं नहीं हूँ, मैं नहीं हूँ'—इस प्रकार की
भावना का अभ्यास तब तक करणीय है जब तक कि आत्मा अभावस्वरूप न बन जाय ।
भावना का विषय तो वही संभाव्य है जिसकी सत्ता हो । यदि 'अभाव' (प्रत्येक भावात्मक
सत्ता का अनस्तित्व = भाव का अभाव = अस्तित्व का अत्यन्ताभाव) अनस्तित्व का ही
पर्याय है तो उसे भावना का विषय बनाया भी कैसे जा सकता है ?
स्पन्दनिर्णयकार कहते हैं कि यदि 'अभाव' कोई भावात्मक सत्ता (जागतिक
अस्तित्व व्यावहारिक सत्य) है तब तो वह अभाव का अभाव होने के कारण स्वयं भाव-
सत्ता (अस्तित्व) बन जाएगा—
'भावनाया भाव्यवस्तु विषयत्वादभावस्य न किंचित्त्वाद् भाव्यमानतायां वा किंचित्त्वे
सत्यभावत्वा भावात् ॥' ('स्पंदनिर्णयः' १/१२)
अभावभावना के उपदेष्टा शास्ता एवं उपदिष्ट शिष्य दोनों को 'अभावब्रह्मवाद' में
आस्था रखने पर—इस आत्मछल को स्वीकार करना पड़ता है कि 'मैं विद्यमान तो होने
का अनुभव तो कर रहा हूँ किन्तु मैं हूँ नहीं'—हमारी सत्ता तो है किन्तु वह सत्ता-
हीनता है ।
अभाववादी यह प्रतिपादित करते हैं कि 'अभावसमाधि' में सर्वाभावरूप विश्वाभाव
ही भावना का विषय बनता है किन्तु यदि 'विश्वोच्छेद' (विश्वाभाव) का अर्थ प्रत्येक सत्ता
का निषेध है तब तो अनुभविता का भी उच्छेद हो जाएगा और फिर इस 'विश्वोच्छेद' का
अनुभव कौन करेगा ?
यदि यह मान लिया जाय कि विश्वोच्छेद होने की दशा में भी अनुभविता का
उच्छेद नहीं होगा तो विश्वोच्छेद की कल्पना वन्ध्यापुत्र के समान निरर्थक होगी—
'किञ्च भावकस्यापि यत्राभावः स विश्वोच्छेदः कथं भावनीयः भावकाभ्युपगमे तु न
विश्वोच्छेदो भावकस्यावशिष्यमाणत्वात् ॥'
'मूढ़ता' एक विशेष प्रकार की जड़ता है जिसमें किसी प्रकार की संवेदना नहीं
रहती । अभाव समाधि का योगी समाधिगत अनुभव को अपनी व्युत्थानावस्था में इस
प्रकार अनुभव करता है—'मैं प्रगाढ़ मूढ़त्व की अवस्था में लीन था और मेरी वह
अवस्था व्यतीत हो चुकी है ।'
वह 'समाधि' समाधि कहने योग्य भी नहीं है जिसमें अपने ज्ञान क्रिया संवलित
चैतन्य की अनुभूति भी न हो सके । उसे मद्यजन्य तामसिक अचेतना के सदृश एक
मोहात्मक अवस्था माना जा सकता है । फिर प्रगाढ़ सुषुप्ति एवं समाधि में भेद क्या रह
जाएगा ?
बौद्धों के 'निर्वाण' की जिस अवस्था को 'शान्ति' कहा जाता है वह भी अन्ततः
'शून्य' ही तो है । 'निर्वाण' में यदि ज्ञान-क्रिया संवेदना (ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व का
संवेदन) का अभाव है तो उसे शैव स्पन्दशास्त्र स्वीकार नहीं करता क्योंकि शैव दार्शनिक