स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in context२८ स्पन्दकारिका
स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा दोनों शास्त्र 'विमर्शवाद' के प्रतिपादक भी हैं । शिव का 'स्वभाव'
'विमर्श' हैं ।
भट्टकल्लट ने 'स्पन्द सर्वस्व' में कहा है कि—शिव 'स्वस्वभाव' है—
'स्वस्वभावस्यैव शिवात्मकस्य' ।
क्षेमराज 'शिवसूत्रविमर्शिनी' में कहते है—
(क) चैतन्यं परमार्थतः 'शिव एव विश्वस्य आत्मा' ।
(ख) चैतन्यम् उक्तं स एव आत्मा । स्वभाव... भावाभाव रूपस्य विश्वस्य जगतः ॥
(ग) चैतन्यं विश्वस्य स्वभावः ॥
(घ) जीवजडात्मनो विश्वस्य परमशिवरूपं चैतन्यमेव स्वभावः ।
(ङ) शंकरात्मक स्पन्दतत्त्वरूपं चैतन्यम् ।
(च) स्वप्रकाशचिदेकीभूतत्वात् चैतन्यमैव ।
(छ) चैतन्य शब्देनोक्तं यत्किंचित् स्वातंत्र्यात्मकं रूपम् ।
(९) स्वस्वभाववाद—शिव 'स्वस्वभाव' है अतः उसका स्वात्माभिनय रूप जगत्
भी 'स्वस्वभाव' है । जगत् स्वस्वभाव शिव को अपना स्वरूप न मानकर परस्वभाव
(परस्वरूप) = शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार एवं अन्य वेद्योँ (प्रमेयों) को
अपना स्वभाव मानता है, उनके साथ तादात्म्य रखने के कारण तद्रूप (परस्वभाव, पर
स्वरूप) बन जाता है । समस्त, दुःख, सुख, मिलन, वियोग, जन्म-मरण बंधन-संसरण
आदि सभी का कारण यही परस्वभाव ग्रहण है । स्वस्वभाव अपनी आत्मा है—अपना
शाश्वत आत्म चैतन्य है—स्पन्द है—शिव है और अपनी शाश्वत आत्मसत्ता हैं । यह
स्वस्वभावावस्थान ही ('तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्'—योगसूत्र) स्वरूपावस्थान है ।
चेतन जब जड़ पदार्थों, अनित्य वस्तुओं एवं अनात्म सत्ताओं के साथ अपना तादात्म्य
स्थापित कर लेता है तब चेतन होकर भी जड़, नित्य होते हुए भी अनित्य एवं आत्मा
होकर भी अनात्मक होने का अनुभव करने लगता है—यही है उसके संसरण एवं बंधन
का कारण । स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा का लक्ष्य 'स्वस्वभाव' की प्राप्ति पर बल देता है ।
(१०) अद्वैतवाद—चूँकि सारे भावों का स्वस्वभाव शक्ति एवं शिव है या
स्पन्दात्मा एवं स्पन्द है । अतः स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा का उद्देश्य उसी स्वस्वभाव (शिव-
शक्ति) के साथ अद्वैतभाव (तादात्म्य, ताद्रूप्य) या एकीभाव की प्राप्ति है । शक्ति एवं
शिव के साथ अपनी अभेदता या अद्वैतभाव की अनुभूति ही स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा का
लक्ष्य है—'विश्वात्मा शिव एवास्मि इति यो वितर्को विचारः एतदेव अस्य आत्मज्ञानम्';
यही अनुभूति आत्मज्ञान है—
सर्वज्ञः सर्वकर्ता च व्यापकः परमेश्वरः ।
स एवाहं शैवधर्मा इति दाढर्याच्छिवो भवेत् ॥ (विज्ञानभैरव)
स्पन्द में कहा गया है—'अयमेवात्मनो ग्रहः' । क्षेमराज ने ठीक ही कहा है
कि—'जीवजडात्मनो विश्वस्य परमशिवरूपं चैतन्यमेव स्वभावः ॥' (क्षेमराज) 'चैतन्यं
विश्वस्य स्वभावः ॥' 'शिव एव विश्वस्य आत्मा' (क्षेमराज) । इन समस्त उदाहरणों से,