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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 236

प्रथमः निष्यन्दः १३५
करने हेतु अनेक कर्तव्य करने की इच्छा होने लगती है। यही अज्ञान है 'अनादिर्याऽ-
शुद्धिरविद्याऽविवेकमूला भोगाभिलाषमलरूपतयाऽसमर्थस्य संकुचितशक्तेः ॥'१
श्रीसात्वत नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है कि—अज्ञान, परिच्छिन्नता, सुख-
दुःख—ये सर्वज्ञ आत्मतत्त्व में इसलिए आ जाते हैं क्योंकि वह कर्मचक्र का आलम्बन
ले लेता है। इसे ही दूसरे शास्त्रों में गमनागमन, प्रकृति, अशुद्धि, कर्मवासना, माया,
अविद्या, भ्रम, मोह, अज्ञान एवं मल आदि नामों से कहा गया है—२
'अज्ञता व्यापकत्वं च सुखदुःखादिवेदनम् ।
सर्वज्ञस्यात्मतत्त्वस्य कर्मचक्रावलम्बनात् ।।
गतीस्वेषा प्रकृत्याख्या शुद्धिः प्राक्कर्मवासना ।
मायाऽविद्या भ्रमो मोहोऽज्ञानं मलमिति क्वचित् ॥'३
गीता में भी कहा गया है कि—प्रकृति एवं पुरुष दोनों अनादि हैं। सारे विकार
एवं सारे गुण प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं—
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान् ।।
'अनादित्वे समानेऽस्या विशेषोऽयं विचारतः ॥'४
प्रकृति और पुरुष की अनादिता समान होने पर भी मायारूप प्रकृति का लय हो
जाता है और आत्मसंवित् ज्यों की त्यों रहती है।
'संवित्प्रकाश' में कहा गया है कि—माया का मायापन यही है कि तत्त्वसाक्षा-
त्कार होते ही मिट जाती है। रज्जु का, ज्ञान होने पर, सर्प, माला आदि मानने का प्रश्न
ही कहाँ ?' और भी कहा गया है—'तुम्हारे अतिरिक्त जो कोई अन्य वस्तु है' इस प्रकार
प्रतीत होता है कि वह विचार करने पर गंधर्व नगर के समान विलीन हो जाती है ।
केवल तुम्हीं शेष रहते हो । इसलिए तुम्हारा नाम शेष है ।'५
मायात्वमेतदेव स्यान्नाशस्तत्त्वप्रदर्शनात् ।
नहि विज्ञातरज्ज्वात्मा सर्पादीन्मन्यते पुनः ॥
त्वत्तो द्वितीयमिहवस्तु यदस्ति किञ्च,
तत्तद्विचार पदवीमवतारितं चेत् ।
गंधर्वपत्तनमिवोपलयं प्रयाति,
त्वं शिष्यसे ध्रुवमतस्तव शेषसंज्ञा ॥६
विद्याधिपति का कहना है कि—समाधि का स्वभाव है—विषय का भोग । जब
युक्तिपूर्वक समाधि लगाने से वह विषय प्रकाश को खा जाती है तब आपकी पदवी हो
जाती है। सर्वभोक्ता और केवल आप ही अभुक्त रह जाते हैं।
भक्षणप्रकृतिना समाधिना युक्तितो विषयधाम्नि भक्षिते ।
सर्वभक्षपदवीमुपेयुषः शिष्यते परमभक्षितो भवान् ॥
१-६. उत्पलदेवाचार्य—स्पन्दप्रदीपिका ।

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