स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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संचालन भी करता है। इसी कारण वह सोचता है कि 'मैने इन्द्रियों को निर्देशित
किया।' वह उस तत्त्व की प्रेरणा के बिना अपने अस्तित्व का त्याग करने हेतु बाध्य हो
जाता है। अतः उस तत्त्व की परीक्षा अवश्य की जानी चाहिए। वह तत्त्व अपनी
प्रकाश-रश्मियों के वर्ग से आविर्भूत अन्तःप्रवाही तरंगों (Inflow of currents) द्वारा
इन्द्रियों एवं प्रमाता (Perceiver) को चेतना, सजीवता (Sentiency) में परिवर्तित
कर देता है। इस प्रकार यह सब कुछ सोपपत्तिक (Logical) है। यदि इसका प्रत्यक्ष
विरोध करते हुए आक्षेपक (Objector) अपने इस विचार पर दृढ़ है कि इन्द्रियाँ इच्छा
रूपी अंकुश के स्वरूप वाली किसी अन्य इन्द्रिय से निर्देशित होती हैं तब तो वह इच्छा
रूपी इन्द्रिय के स्वरूप का होने के कारण अपने संचालन के लिए अन्य इन्द्रिय की
अपेक्षा करने लगेगा और फिर वह भी किसी दूसरे इन्द्रिय की अपेक्षा करने लगेगा तब
तो अनन्त श्रेणी-परम्परा उत्पन्न हो जाएगी जो कि कभी समाप्त ही नहीं होगी।१
मनुष्य अपनी इच्छा को याथार्थ्य या परासत्ता के परीक्षणार्थ प्रस्तुत नहीं कर सकता
क्योंकि परासत्ता अज्ञेय (Inconceiveble) है अतः अपनी इच्छा के द्वारा उसे नहीं
समझा जा सकता। किन्तु जब वही प्रमाता अपनी इच्छाओं को शान्त कर लेता है,
स्पन्द तत्त्व का संस्पर्श कर लेता है या अन्तर्मुखी आत्मा को छू लेता है, विषयों की
सोत्कण्ठ शोध (Hot pursuit of the objects) द्वारा, इसे पूर्ण एवं अभीष्ट परितृप्ति
(Satiation) हेतु अनुमति प्रदान करते हुए जब स्पन्दतत्त्व का स्पर्श करता है और
चैतन्य द्वारा अपनी इन्द्रियों को समलंकृत करते हुए अग्रपद होता है तब वह 'उसके'
सदृश हो जाता है।२ ऐसी स्थिति में वह इसके अन्तःप्रवाह (Inflow) के द्वारा उस
तत्त्व के सदृश सर्वत्र स्वातन्त्र्य प्राप्ति कर लेगा। इसीलिए कहा गया है याथार्थ्य
(Reality) की परीक्षा की जानी चाहिए।३
यहाँ पर 'स्पर्श' शब्द आत्म शक्ति के संदर्भ में प्रयुक्त किया गया है।
१. चिद्रूप आत्मा का जो स्पन्दतत्त्वात्मक बल है उसके स्पर्श से स्वल्प मात्रक
आवेश से भी साधक 'उसके' समान हो जाता है—
'आत्मनश्चिद्रूपस्य यद्बलं स्पन्दतत्त्वात्मकं तत्स्पर्शात् तत्कृतात् कियन्मात्रात् आवे-
शात् तत्समो भवेत् ॥'४
२. अहन्ता के रस से अभिषिक्त अचेतन भी चेतन हो जाता है—
'अहन्तारसविप्रुड अभिषेकात् अचेतनोऽपि चेतनताम् आसादयति।'
३. सांसारिक पुरुष तत्त्वपरीक्षणार्थ इच्छाओं को प्रवर्तित करने में सक्षम नहीं है
क्योंकि तत्त्व अविकल्प्य (inconceivable) है अतः वह अपनी इच्छा से तत्त्व को
विषय बनाने में समक्ष नहीं है—
'नायं पुरुषः तत्त्वपरीक्षार्थं इच्छां प्रवर्तयितुं शक्नोति—
१-४. स्पन्दनिर्णय।