स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
DevanagariHindipublished519 pages
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प्रथमः निष्यन्दः १२५
ख) गोपित पारमार्थिक चिद्गगनचरीत्वस्वरूपेण चकास्ति ।
ग) भेदनिश्चयाभिमान विकल्पन प्रधानान्तःकरणदेवीरूपेण गोचरीक्रमेण गोपिता-
भेदनिश्चयाद्यात्मकपारमार्थिकस्वरूपेण प्रकाशते ।। ('प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' क्षेमराज)
आत्मबल प्राप्त होने पर 'पशु' भी 'पशुपति' बन जाता है—
नहीच्छानोदनस्यायं प्रेरकत्वेन वर्तते ।
अपित्वात्मबलस्पर्शात्पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥ ८ ॥
यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि (मितप्रमाता) पुरुष मात्र पारमेश्वरी आकांक्षा
के अंकुश का प्रेरक बनकर ही नहीं रहता प्रत्युत् आत्मबल का संस्पर्श
प्राप्त करने की दशा में (वह) पुरुष उसी (पति प्रमाता = परशिव) के समान हो जाया
करता है ॥ ८ ॥
- सरोजिनी *
'नहि' = न खलु ।
'नहि' = नहीं । 'नोदन' = (नुद्यते अनेन इति) प्रेषण ।
(नुद् + ल्युट्) । प्रेरणा । चलाने का, हाँकने का काम । (हाँकने का पैना) ।
प्रतोद । (अंकुश) । अयं = इस आन्तर पुरुष को । 'बल' = सामर्थ्य ।
'अपितु' = प्रत्युत । बल्कि । 'हि' = ही, केवल (स्पन्द प्र०) ।
आत्म बल = अपनी शक्ति । आत्मा की शक्ति । 'इच्छानोदन' = इच्छा प्रेषण ।
इच्छा ही नोदन है—प्रतोद है । 'अयं' = लौकिक पुरुष । नोदन = प्रेरक (Pusher)
लौकिक पुरुष इन्द्रियों को अपने विषयों में प्रवृत्त होने हेतु प्रवृत्त नहीं करता इन्द्रियों को
अपने विषयों की ओर नहीं लगाता । स्पन्दनिर्णय (क्षेमराज)
यह जीवात्मा (पुरुष) केवल इच्छा-प्रेषण या करण-समूह की प्रेरणा का स्वतन्त्र
कर्ता ही नहीं है प्रत्युत् अपने निरावरण चिद्रूपत्व, ज्ञत्व, कर्तृत्व आदि शक्ति के स्पर्श से
वही हो जाता है अर्थात् यह स्वयं सर्वज्ञ एवं सर्वकर्ता है । आत्मा में पूर्ण स्वातन्त्र्य
निहित है । (स्प०प्र०) ।१
'प्रेरकत्वेन वर्तते' = इन्द्रिय वर्ग के प्रति उत्प्रेरक होने से यह पुरुष संसारी प्रमाता
बनता है । वर्तते = (अवतिष्ठते) स्थित है । यह आन्तर पुरुष अपनी इच्छा से जड़
करण वर्ग को अपने विषय में उत्प्रेरित नहीं करता प्रत्युत यह आत्मबल के स्पर्श से
करता है । पर प्रमाता, सर्वकर्ता ईश्वर का जो यह स्वभाव है कि वह बिना करणों की
अपेक्षा के ही समस्त वस्तुओं का संपादन कर डालता है उसके संपर्क से या स्पर्श से
उसके समान ही बन जाता है ।२ तत्समो भवेत् = स्वस्वभाव में स्थित परमात्मा इस
जगत् की सृष्टि स्थिति-संहृति तीनों करने में स्वतन्त्र है । इसी प्रकार यह संसारी पुरुष भी
१-२. स्पन्दप्रदीपिका ।