स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in contextप्रथमः निष्यन्दः १२३
सारांश—समस्त शक्तिचक्र, बाह्य इन्द्रिय समूह, समस्त जड़ प्रमेय वर्ग आदि को
अस्तित्व प्रदान करने वाला मात्र स्पन्द तत्त्व (अहं प्रत्यवमर्शात्मिका संवित् शक्ति) ही है।
पूर्ववर्ती कारिकाओं में स्पन्द तत्त्व को पारमार्थिक सत्ता के रूप में स्थापित,
प्रतिष्ठित एवं सिद्ध करने के अनन्तर अग्रवर्ती कारिकाओं (६,७) में कारिकाकार ने विश्व
के प्रत्येक अणु-परमाणु में एक ही स्पन्दात्मिकी संवित् शक्ति के स्वातन्त्र्य-विस्तार का
विवेचन किया है। यही परस्वतन्त्र पारमेश्वरी 'स्पन्दशक्ति' अपनी अप्रतिहत 'स्वातन्त्र्य
शक्ति' के द्वारा जड़ प्रमेयों में भी व्याप्त है।
कारिकासूत्रकार कहते हैं—
जिस स्पन्दात्मक आत्मबल के स्पर्श मात्र से आन्तर शक्ति चक्र (खेचरी आदि
शक्तिचक्र) के साथ ही साथ समस्त इन्द्रिय-समूह को अचेतन होने पर भी चेतन की
भाँति सृष्टि, स्थिति एवं संहार करने की शक्ति प्राप्त होती है उस स्पन्दात्मस्वभाव तत्त्व
का परीक्षण एवं आदर प्रयत्नपूर्वक करना चाहिए। क्योंकि उस स्पन्दात्मक आत्मतत्त्व
की स्वतन्त्रता स्वाभाविक रूप से 'प्रत्येक अणु में व्याप्त है। (६।७) ॥
सरांश = १. स्पन्दात्मक आत्मबल खेचरी, गोचरी, दिक्करी भूचरी शक्ति समूह
को एवं अचेतन इन्द्रियों को सृष्टि-स्थिति-संहार करने की शक्ति प्रदान करता है।
२. स्पन्दात्मक आत्म तत्त्व का प्रयत्नपूर्वक सादर परीक्षण करना चाहिए।
३. ऐसे स्पन्दात्मक आत्म तत्त्व की अकृत्रिमा स्वतन्त्रता विश्व के प्रत्येक अणु में
(प्रत्येक शरीर एवं प्रत्येक अवस्था में) संचरित हो रही है।
४. सहज स्वातन्त्र्य (स्वतन्त्र अहं प्रत्यवमर्श) ही प्रत्येक पदार्थ का वास्तविक
स्वभाव बनकर अवस्थित है। अर्थात् प्रत्येक पदार्थ का स्वस्वभाव सहजस्वांत्र्य है।
'यतः' = चूँकि। जिसके द्वारा। 'करणवर्ग' = इन्द्रियों का समूह।
'विमूढ़' = अचेतन। अमूढ़ = चेतन। सहान्तरेण चक्रेण = आन्तर शक्ति चक्र
के ही साथ। प्रवृत्ति-स्थिति-संहती: = सृष्टि-स्थिति-संहार। तत् = उस। स्पन्दात्मक
स्वभाव। आत्मा तत्त्व = आत्मा। यतः = क्योंकि। इयम् = यह।
अकृत्रिमा = स्वाभाविक।
प्रश्न—यः 'अन्येषां चैतन्यापादने समर्थः कथं निःस्वभावः ?'
जो जड़ पदार्थों को भी चैतन्य प्रदान करता है वह स्वयं स्वभावहीन—चैतन्यहीन
कैसे हो सकता है ? यह कथमपि संभव नहीं है।
भट्टकल्लट कहते हैं—यतः करणवर्गस्य अन्तश्चक्रसहितस्य विमूढस्याप्यमूढवत्
उत्पत्तिस्थितिनिरोधाः, सोऽन्येषां चैतन्यापादने समर्थः कथं निःस्वभावः ? तस्मात् तत्
तत्त्वं यत्नेन परीक्षितव्यं योगिना, यथास्य करणादिषु चैतन्य दाने स्वातन्त्र्यम्, तथा
परपुरादिष्वपि संभाव्यते, स्वातन्त्र्यस्य स्वस्वभावभूतस्य सर्वत्राकृत्रिमस्याभ्यासात् यतो
व्यक्तिः ॥ ६-७ ॥