Skip to content
SarvaKosh
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 216 of 519

Read in context
Page 216

प्रथमः निःष्यन्दः ११५
'अद्वैतं परमार्थो हि द्वैतं तद्भेद उच्यते ।' १
शङ्कराचार्य कहते हैं— 'अद्वैतं परमार्थो हि यस्मादद्वैतं नानात्वं तस्याद्वैतस्य भेद-
स्तद्भेदस्तस्य कार्यम् ।' 'एकमेवा द्वितीयम् ।।' (छा० ३६।२।२)
आचार्य गौड़पाद 'परमार्थ' का यह स्वरूप मानते हैं—
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः ।
न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ।।' (माण्डूक्यकारिका)
शङ्कराचार्य कहते हैं— 'जब द्वैत असत् है और एकमात्र आत्मा ही परमार्थतः सत्
है । यह समस्त लौकिक और वैदिक व्यवहार अविद्या का ही विषय है— 'यदा वितथं
द्वैतमात्मैवैकः परमार्थतः संस्तदेदं निष्पन्नं भवति सर्वोऽयं लौकिको वैदिकश्च व्यवहारोऽ-
विद्या विषय एवेति ।' १ गौड़पादाचार्य द्वैत को यथार्थ नहीं प्रत्युत् चित्त का 'स्पन्द' मात्र
मानते हैं—
'चित्तस्पन्दितमेवेदं ग्राह्यग्राहकवद्द्वयम् ।
चित्तं निर्विषयं नित्यमसंगं तेन कीर्तितम् ।।' २
जो पदार्थ कल्पित व्यवहार के कारण होता है वह परमार्थतः नहीं होता— 'योऽस्ति
कल्पित संवृत्या परमार्थेन नास्त्यसौ ॥ ३
शैवी स्वातन्त्र्य शक्ति के द्वारा आन्तर शक्तिचक्र के साथ अचेतन इन्द्रियों
को भी चैतन्य प्रदान किये जाने का प्रतिपादन
यतः करणवर्गोऽयं विमूढो मूढवत्स्वयम् ।
सहान्तरेण चक्रेण प्रवृत्ति-स्थिति-संहतीः ॥ ६ ॥
लभते तत्प्रयत्नेन परीक्ष्यं तत्त्वमादरात् ।
यतः स्वतन्त्रता तस्य सर्वत्रेयमकृत्रिमा ॥ ७ ॥
जिस स्पन्दात्मक शक्ति के द्वारा आन्तर शक्ति चक्र के साथ ही साथ चैतन्य शून्य
इन्द्रिय-समूह को भी चेतन की भाँति सृजन, स्थिति एवं संहार का करने की शक्ति प्राप्त
हो जाती है उस (स्पन्दात्मक स्वभाव) तत्त्व की परीक्षा श्रद्धा-विश्वास एवं सम्मान के साथ
प्रयासपूर्वक करनी चाहिए। क्योंकि उस (स्पन्दतत्त्व) की (आत्मधर्मभूता) यह स्वतन्त्रता-
सर्वत्र अकृत्रिम (सहज या स्वाभाविक) है ॥ ६-७ ॥

  • सरोजिनी *
    पूर्व कारिका में स्पन्द तत्त्व की परमार्थता सिद्ध करके सूत्रकार इन दो सूत्रों में
    स्पन्दात्मक शैवी स्वातन्त्र्य शक्ति के द्वारा जड़ पदार्थों को भी चैतन्य प्रदान करने का
    विवेचन कर रहे हैं ।
    यहाँ उपपत्तियों द्वारा परिघटित तत्त्व की प्रत्यभिज्ञा हेतु उपायों का साभिज्ञान
    १-३. शांकरभाष्य—माण्डूक्यकारिका ।