स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in contextप्रथमः निष्यन्दः ११३
'न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यो न ग्राहको न च ।
न चास्ति मूढभावोऽपि तदस्ति परमार्थतः ।।' (५)
स्पन्द तत्त्व का यथार्थ स्वरूप—१. यह सुख, दुःख, ग्राह्यता, ग्राहकता, मूढ़ता
आदि सभी से असंयुक्त है। ये इनका स्पर्श भी नहीं कर सकते।
२. यही तत्त्व परमार्थ सत् है क्योंकि वह नित्य है।
३. सुख, दुःख आदि मानसिक संकल्प हैं, क्षुण्य हैं, और आत्मा के यथार्थ
स्वरूप से पृथक् हैं।
४. आत्मा सुख-दुःखादि अनुभूति से परे होने के कारण नित्य, अक्षर, विभु,
स्पन्दात्मक एवं चेतन है। लेकिन सुख दुःखादि की अनुभूतियों से परे होने के कारण
वह प्रस्तर नहीं है।
५. भट्टकल्लट—इन्हीं भावों को इन शब्दों में व्यक्त करते हुए कहते हैं कि
'तस्य चायं स्वभावो यत् सुखदुःखग्राह्यग्राहकमूढ़तादिभावैरस्पृष्टः । स एव च
परमार्थतोऽस्ति नित्यत्वात् । सुखादयः पुनः संकल्पोत्थाः क्षणभंगुरा आत्मस्वरूपबाह्याः
शब्दादिविषयतुल्याः । न च सुखादिस्वरूपो यदा नासौ तदा पाषाणप्रख्य एव ।।'१
'न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यो न ग्राहको न च'
कारिकाकार ने सुख, दुःख आदि चित्तवृत्तियों का उल्लेख किया है वे क्या है?
स्पन्दात्मिका संवित् भट्टारिका जब विश्वरूप में प्रसृत होने हेतु उन्मुख होती है तब
अपनी बहिर्मुखता के इस बाह्य स्तर पर सर्वप्रथम प्राण के रूप में परिणत होकर
अन्तःकरण का रूप धारण करती है। त्रिगुणमय अन्तःकरण सुख, दुःख एवं मोह आदि
अवस्थायें भी आत्मस्वरूप से पृथक् नहीं हैं क्योंकि ज्ञान रूपा परमेश्वरी से अतिरिक्त
अन्य किसी भी वस्तु की सत्ता नहीं है तथा ज्ञान सत्ता का आश्रय लिए बिना किसी भी
वस्तु की सत्ता संभव नहीं है—
'तत्तद्रूपतया ज्ञानं बहिरन्तः प्रकाशते ।
ज्ञानादृते नार्थसत्ता ज्ञानरूपं ततो जगत् ।।'
'नहि ज्ञानादृते भावाः केन चिद्विषयीकृताः ।
ज्ञानं तदात्मतां यातमेतस्मादवसीयते ।।'
विशुद्ध चित् तत्त्व अखण्ड है, ज्ञानात्मक है, स्पन्दात्मक है, एकाकार है एवं
सुख, दुःख, ग्राह्य, अग्राह्य उपाधियों से अतीत है। यह परमार्थ सत् है। प्रत्येक प्रमाता
सुख, दुःख, नील, रक्त, अल्प, प्रचुर आदि वेद्य पदार्थों के रूप में स्वयं अवभासित हो
रहा है। चित् तत्त्व का स्वरूप विश्वात्मक अहं विमर्श है।
अहंविमर्श के दो प्रकार हैं—१. शुद्ध = आत्मरूप, २. अशुद्ध = प्रमेय रूप।
क) शुद्ध अहं विमर्श—पति प्रमाता का है। शुद्ध अहं विमर्श में—समस्त
१. भट्टकल्लट—'स्पन्दसर्वस्व' ।
स्पं० ८