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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 207 of 519

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Page 207

१०६ स्पन्दकारिका
वेदक नहीं बन सकते । 'वेद्य' अर्थ-प्रकाशक नहीं हो सकता । वस्तु के अनुभव क्षण में
स्मृति क्षण नहीं, तथा स्मृति क्षण में अनुभवक्षण नहीं, तो फिर स्मृति क्षण में अनुभव
क्षण के वस्त्वाकार, वस्तुस्वरूप कैसे प्रकाशित होंगे? इसे संस्कारों से समझाया जाय तो
अनुभवकालिक संस्कार तो तद्गतज्ञान (निर्विकल्पक ज्ञान) को ही स्मृति क्षण में प्रस्तुत
करेंगे फिर सविकल्पक ज्ञान होगा कैसे?
स्पन्दशास्त्र कहता है कि इन दोनों (अनुभव क्षण रूप निर्विकल्पक ज्ञान एवं
स्मृतिक्षण रूप सविकल्पक ज्ञान) ही ज्ञानक्षणों के मध्य इनसे पृथक् एवं स्वयंप्रकाश सत्ता
'स्पन्द' है जिसमें समस्त अनुभव, स्मृतियाँ, आकार, रूप, गुण, विशेषताएँ आदि बीज
में स्थित जड़ तना, शाख फल आदि की भाँति मयूराण्ड रसन्याय से स्थित रहती है और
यही चेतन सत्ता निर्विकल्प ज्ञान को सविकल्पक बनाती है ।
मीमांसा की आत्मविषयक दृष्टि की समीक्षा—यदि सुख-दुःख आदि से
विशिष्ट 'मैं' की प्रतीति ही को आत्मा का स्वरूप मान लिया जाय तो चूँकि सुख-दुःख
आदि वृत्तियाँ तो अन्तःकरण की वृत्तियाँ हैं अतः क्या इनसे अतीत स्तर पर आत्मा का
अस्तित्व नहीं स्वीकार किया जाएगा ? उपनिषदों में तो आत्मा को इन्द्रिय, अर्थ, मन,
बुद्धि आदि सभी से परे माना गया है—
'इन्द्रियेभ्यः पराह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिः बुद्धेरात्मा महान् परः ॥'
ऐसी स्थिति में सुख-दुःख-लाभ-हाँनि-ईर्ष्या-द्वेष-भय-मोह-प्रेम-द्रोह-आदि सभी से
एवं मन-बुद्धि-चित्त तथा अहंकार से अतीत आत्मा के इस स्तर की व्याख्या कैसे की जा
सकेगी?
यदि सुखदुःखादिक चित्त वृत्तियों की पराधीनता में ही आत्मा को अपनी सत्ता
स्थिर रखनी है तो उसे चेतन एवं स्वतन्त्र कैसे कहा जा सकेगा ? यदि कुमारिल भट्ट
आत्मा को चैतन्यस्वरूप न मानकर चैतन्य-विशिष्ट स्वीकार करते हैं तो फिर आत्मा में
यह चैतन्य कहीं बाहर से आया हुआ स्वीकार करना पड़ेगा । बाहर से यह कहाँ से
आया? चैतन्य को आत्मा का स्वस्वरूप न मानकर उसे उसका 'विशेषण' (गुण) बताना
और आत्मा को उसका 'विशेष्य' बताना तथा—गुण-गुणी, धर्म-धर्मी, विशेषण-विशेष्य
के सम्बन्ध में बाँधना आत्मा की चेतनता एवं स्वतन्त्रता पर कुठाराघात है । विश्वात्मा तो
गुणों को सत्ता प्रदान करके भी स्वयं गुणातीत है—रूप देकर भी रूपातीत है—आकार
देकर भी आकारातीत है—इन्द्रियाँ देकर भी इन्द्रियातीत है ।
मीमांसक भी आत्मा को सुखदुःखादिविशिष्ट 'अहं' की प्रतीति कहकर परतत्त्व को
मात्र बुद्धि की सीमा तक ही सीमित मानकर प्रकृति के विकार बुद्धि को ही लक्ष्मणरेखा
मानकर उससे परे चिन्तन नहीं कर पाते और बुद्धि के स्थूल धरातल पर ही अपनी
तात्त्विक यात्रा समाप्त कर देते हैं ।
लोकायतों की दृष्टि की समीक्षा—चार्वाकी दृष्टि (बार्हस्पत दृष्टि) देहात्मवाद,
प्रत्यक्षवाद एवं आधिभौतिक सुखवाद के स्थूलतम धरातल पर आधृत हैं । इसमें आत्मा,