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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 184 of 519

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Page 184

प्रथमः निष्यन्दः ८३
स्वरूपच्युत नहीं होता प्रत्युत् अभेदस्वरूप ही रहता है—यही सभी को अनुभव होता
है—‘अवस्थाभेदेऽपि उपलब्धृलक्षणस्य अवस्थातुः अभेदः, इति सर्वस्य अत्र स्वानुभवः
प्रमाणम् ।।'¹
‘जो मैं सोया था वही मैं अब जाग रहा हूँ'—इस प्रकार की एकानुसंधानात्मक
अनुभूति जाग्रदादिक सभी अवस्थाओं में चलती रहती है । जिस प्रकार एक देह में
अवस्थाव्यतिरिक्तस्वरूप उपलब्धा एक ही रहता चला आता है । उसी प्रकार समस्त देहों में
भी एक ही आत्मा रूप उपलब्धा निरन्तर एक ही रहता चला आता है ।²
प्रत्येक प्राणी में जो ‘अहमस्मि' की पृथक्-पृथक् अनुभूति होती है यह पार्थक्य-
संवलित अस्मद् प्रत्यय मायीय है न कि तात्त्विक । योगशास्त्रों में प्रख्यात जाग्रदादिक
अवस्थाओं में भी उस आत्मसंवित् में अभेदता बनी ही रहती है क्योंकि संवित् तत्त्व वहाँ
भी उपलब्धक के रूप में ही स्थित रहता है । क्योंकि—योगशास्त्र की साधनावस्थाओं-
एवं जाग्रदादिक अवस्थाओं में भी साम्य है, अभेद है—अभिन्नता है ।
(‘एताभिः अवस्थाभिः योगशास्त्र प्रसिद्धास्वपि जाग्रदाद्यवस्थासु तस्य अभेदः प्रति-
पादितो वेदितव्य । तास्वपि तस्य उपलब्धृत्वेन व्यापकत्‍या अवस्थानात्') ।
१. जाग्ररावस्था एवं धारणा में अभेद—³
‘तत्र ध्येये अर्थे झगिति प्रवृत्तिमात्रं जाग्ररावस्था, धारणा इति क्वचित्प्रसिद्धा ।'
२. स्वप्नावस्था एवं ध्यान में अभेद—⁴
‘तत्रैव विसदृशप्रत्ययपरिहारेण समान प्रत्यय प्रवाहैकतानतानुसंधानं स्वप्नावस्था
ध्यानम् इति याम् आहुः ।
३. ‘सुषुप्तावस्था एवं समाधि में अभेद—⁵
‘क्रमेण ऐकायातिशयात् प्रत्ययान्तरासंकीर्णसूक्ष्मध्येयाभासमात्रविशेषता चित्तस्य
संवेद्यसुषुप्तावस्थायां वितर्कविचारानन्दास्मितानुरूपानुगमलक्षस्य संप्रज्ञातस्य समाधेः
आनन्दास्मितामात्रानुगतम् अवस्थाविशेषम् आचक्षते । यस्तु—‘विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः
संस्कारशेषोऽन्यः' (पा० १७)— इति कृतलक्षणः असंप्रज्ञातसमाधिः, तत अप-वेद्य
सुषुप्तम् ।। (सर्वासु एतासु च अनुभावितृरूपस्य व्यापकस्य एकस्य स्वभावस्य सत्ता
स्थितैव) ।।⁶ सारांश यह कि इन समस्त योगावस्थाओं एवं जीवों की जाग्रदादिक सभी
अवस्थाओं में अनुभविता, अद्वैत, सर्वव्यापक संवित्तत्त्व रूप स्वस्वभाव की सत्ता अखण्ड
रूप में प्रवाहित है और वह अभेदरूप है ।
४. सालम्बन समाधि—‘यतः सालम्बने तावत् समाधौ व्यतिरिक्तवेद्यसद्भावात्
लौकिकावस्थावत् वेदकस्य उपलब्धुः सत्वं स्फुटम् एव ।⁷
५. निरालम्बन समाधि—‘यत्र तु निरालम्बनत्वात् अभावरूपत्वं तत्र तत्कालमेव
१-७. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति ।