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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 182 of 519

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Page 182

प्रथमः निष्यन्दः ८१
आचार्य क्षेमराज इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि यद्यपि चेतना की जाग्रत,
स्वप्न एवं सुषुप्ति की धारायें पृथक्-पृथक् हैं एवं योगियों को अवधान, धारणा, एकाग्रता
ध्यान एवं समाधि आदि के रूप में भी वे पृथक्-पृथक् दृष्टिगोचर होती हैं तथापि वह
स्पन्द तत्त्व जो कि समस्त विश्व के जीवन का प्राणतत्त्व है (वह) अपरिवर्तित रूप में
नित्य, एकरस एवं अखण्डप्रवाहित रहा करता है क्योंकि यदि वही निवर्तित हो जाय-तब
तो जाग्रत = स्वप्न-सुषुप्ति की अवस्था में प्राणी में जाग्रत अवस्था वाली प्रत्यभिज्ञा-
शक्ति (Cognitive Power) तो विद्यमान नहीं रहती तथापि इस अवस्था में भी उसका
वहाँ अस्तित्व विद्यमान ही रहता है क्योंकि उसे सुषुप्ति के पूर्व की, स्वप्न की, एवं
सुषुप्तिगत सुस्वाप की अनुभूतियाँ सोने के बाद पुनः जागने पर भी अविच्छिन्न रूप में
बनी रहती हैं। स्पन्द तत्त्व अपने यथार्थ स्वरूप या बोधस्वरूपता से कभी पृथक् नहीं
हुआ करता चाहे उसके माहात्म्य के कारण जागृत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति आदि अवस्थायें
भले ही नष्ट क्यों न हो जायें।
'एव'—यहाँ 'एव' शब्द 'अपि' के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।¹ भाव यह है कि—
उनकी (उन अवस्थाओं की) अनुपस्थिति में भी वह नित्य स्पन्द तत्त्व अपने स्वस्वरूप से
च्युत नहीं होता—निरुद्ध नहीं होता।
'तदभिन्ने' का अर्थ क्या है? 'उससे भिन्न नहीं' अर्थात् इसका प्रथम तात्पर्य है—
'नानुभूयते न निरुध्यते । न निरोत्स्यते ।'²
'तदभिन्ने' = 'उससे भिन्न नहीं'। अर्थात् जागृदादि अवस्थाओं में तो परस्पर
भिन्नता है किन्तु 'स्पन्दतत्त्व' में भिन्नता नहीं है।
'तदभिन्ने' = जागृदादि अवस्थाओं से अभिन्न। अर्थात् जागृदादि अवस्थायें भले
भिन्न-भिन्न हों तथा स्पन्दतत्त्व भी अभिन्न होने के कारण इन अवस्थाओं से भिन्न हो
तथापि यह मानना ही पड़ेगा कि तत्त्वतः ये जागृदादि अवस्थायें भी स्पन्द तत्त्व से
अभिन्न हैं क्योंकि वे उसी का आश्रय लेकर जीवित रहने के कारण स्पन्द से एकरूप हैं।
शिवस्वभाव से अभेदात्मक रूप में प्रकाशमान होने के कारण अवस्थायें भी प्रकाशरूप
हैं—'तस्मात् शिवस्वभावाद् अभेदेन प्रकाशमानत्वात् प्रकाशरूपेत्यर्थः ।'³ जो एकात्मक
है वह किस प्रकार उसके निवृत्त हो जाने पर भी स्थित रह सकेगा ? किसी भी एक वस्तु
की सत्ता एक दूसरे के बिना असंभव है।⁴
'अभिन्न' = शिवतत्त्व । स्वस्वभाव = आत्मा ।
'स्वस्वभाव' = निर्मलचिन्मात्ररूप । जो पदार्थ इदन्तापन्न प्रमेयों का प्रकाशक होने
के कारण उनकी स्थिति (अस्तित्व) का मूलाधार हो, जो कर्ता होने के कारण प्रमेयों का
कारण (उत्पत्तिस्थान) हो और जो अपनी अनवच्छिन्न महिमा से महिमान्वित निर्मल-
चिन्मात्रैकरूप हो—वही है 'स्वस्वभाव'। 'यः पदार्थः सर्वस्य इदन्तापन्नतया प्रमेयभूतस्य
... प्रकाशकत्वेन स्थितिहेतुत्वात् आधारभूतः .... अनवच्छिन्नमहिमा निर्मलचिन्मात्रैकरूपः
१-४. स्पन्दनिर्णय ।
स्पं० ६