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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 176 of 519

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Page 176

प्रथमः निष्यन्दः ७५
२. सत्यं यदि स्याज्जगदेतदात्मनोऽनन्तत्वहानिर्निगमाप्रमाणता ।
असत्यवादित्वमयीशितुः स्यान्नैतत्त्रयं साधु हितं महात्मनाम् ॥
३. यदि सत्यं भवेद्विश्वं सुषुप्तावुपलभ्यताम् ।
यन्नोपलभ्यते किंचिदतोऽसत्स्वप्नवन्मृषा ॥१
अतःपरमात्मा से पृथक् जगत् है ही नहीं। उसकी पृथक् प्रतीति तो गुणी से गुण
आदि की पृथक् प्रतीति के सदृश मिथ्या ही है। आरोपित वस्तु की वास्तविकता ही
क्या? वह तो अधिष्ठान ही भ्रम से उस प्रकार भासित हो रहा है। अज्ञानी जनों को
अज्ञानवश जो कुछ प्रतीत हो रहा है वह सब ब्रह्म ही है जिस प्रकार भ्रम से प्रतीति हुआ
रजत = वस्तुतः सीपी है। 'यह जगत् है' इसमें 'इदम्' रूप से सदा ब्रह्म ही कहा जाता
है, ब्रह्म में आरोपित जगत् तो नाममात्र ही है।
१. अतः पृथङ्नास्ति जगत्परात्मनः,
पृथक्प्रतीतिस्तु मृषा गुणादिवत् ।
आरोपितस्यास्ति किमर्थवत्ता-
धिष्ठानमाभाति तथा भ्रमेण ॥
२. भ्रान्तस्य यद्यद्भ्रमतः प्रतीतं ब्रह्मैवतत्तद्रजतं हि शुक्तिः ।
इदंतया ब्रह्म सदैव रूप्यतेत्वारोपित ब्रह्मणि नाममात्रम् ॥२
'परिणामवाद'-अवस्थान्तरपरिणमन ही 'परिणाम' है-
(क) अतत्त्व-प्रथा = 'विवर्त' (ख) सतत्त्व-प्रथा-'परिणाम' परिणाम में एक
रूप का तिरोभाव एवं रूपान्तर का आविर्भाव होता है-परिणामे तु रूपान्तरं तिरोभवति,
रूपान्तरं च प्रादुर्भवतीत्युक्तम् ॥३ असत्य रूप में निर्भास ही 'विवर्त' है 'विवर्तो हि
असत्य रूपनिर्भासात्मेत्युक्तम् ।' (अभिनवगुप्तः ई०प्र०वि०वि०)
शुक्ति में रजताभास 'विवर्त' है और दूध का दही में परिणमन 'परिणाम' है।
'परिणाम' अपने उपादान का समसत्ताक होता है किन्तु 'विवर्त' अपने उपादान का
'विषम-सत्ताक' होता है यथा रज्जु में अहि का भ्रम ॥
भास्करराय का 'अविकृत परिणामवाद' - भर्तृहरि, शान्तरक्षित ('तत्त्वसंग्रह')
एवं भवभूति 'विवर्त' एवं 'परिणाम' को एकार्थक मानते रहे जब कि दोनों शब्द विष-
मार्थी है।
अविकृत परिणामवाद - भास्करराय जगत् को 'परिणाम' मानते हैं किन्तु
प्रचलित परिणामवाद के सिद्धान्त से पृथक् अर्थ में। भास्करराय कहते हैं-
१. मृत्तिका एवं घट में कोई भेद नहीं है उसी प्रकार जगत् और ब्रह्म में कोई भेद
नहीं है। ब्रह्म सत्य है तो जगत् भी सत्य है। भेदभावना ही मिथ्यात्व है-
१-२. विवेकचूड़ामणि ।
३. ई०प्रत्यभिज्ञाविवृत्ति वि० (पृ ८, अ १, वि० १)