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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 174

प्रथमः निष्यन्दः ७३
रूपवान् चन्द्र का प्रतिबिम्ब रूपवान् जल में ही पड़ता है किन्तु ब्रह्म के रूपहीन होने से
न तो उसका प्रतिबिम्ब संभव है और न रूपहीन अन्तःकरण में प्रतिबिम्ब उत्पादन की
शक्ति ही है ।
२. 'अवच्छेदवाद'—वाचस्पतिमिश्र—
वाचस्पतिमिश्र अवच्छेद को ही युक्तियुक्त मानते हैं । इस पक्ष में एक ही चैतन्य
अज्ञान के आश्रय एवं विषय के भेद से दो प्रकार का है । अज्ञान का विषयीभूत चैतन्य
ईश्वर है । अज्ञान का आश्रयभूत चैतन्य ही 'जीव' है या अन्तःकरण से अवच्छिन्न
चैतन्य जीव और अविद्यावच्छन्न चैतन्य 'ईश्वर' है । अज्ञान के नानात्मक होने से
इस मत में जीव भी नानात्मक हैं । इस पक्ष में स्वाज्ञान से उपहित होने से जीव जगत्
का उपादान कारण है । ईश्वर उपचारमात्र से कारण माना जाता है । ('सिद्धान्तबिन्दु'
पृ० ८०)।
३. एकजीववाद—
वेदान्त का यही मुख्य सिद्धान्त है । इस मत में अज्ञानरूपी उपाधि से विरहित
शुद्ध चैतन्य 'ईश्वर' है और अज्ञानोपहित चैतन्य 'जीव' है । जीव ही अपने अज्ञानवश
जगत् का उपादान कारण एवं निमित्तकारण है । देहभेद से जीवभेद की प्रतीति भ्रान्ति
पूर्ण है क्योंकि वस्तुतः जीव एक ही है । गुरु की कृपा तथा शास्त्र विहित श्रवणादि
उपायों से एक ही आत्मा का मोक्ष होता है । वामदेवादियों की मोक्षवार्ता अर्थवाद मात्र
है । इसी सिद्धान्त का अपरपर्याय 'दृष्टिसृष्टिवाद' है ।
कुछ वेदान्तियों के मतानुसार—
कुछ वेदान्तियों की सम्मति में जिस प्रकार कौन्तेय (कौन्ती-पुत्र कर्ण) की ही
अविद्या के कारण राधेय (राधापुत्र) रूप से प्रतीति होती है उसी प्रकार अविकृत ब्रह्म ही
अविद्या से जीवभाव प्राप्त करता है । व्याधकुलवर्धित राजपुत्र के समान जीव अविद्या
के वशीभूत होकर अपने शुद्ध बुद्ध मुक्तस्वभाव को विस्मृत किए हुए हैं । आचार्योपदेश
से शुद्ध सच्चिदानन्द रूप को जानते ही वे मुक्त हो जाते हैं ।
४. आभासवाद—
अद्वैतमत में एक आत्मा ही सत्य है । आत्मा न तो अन्तर्यामी है और न तो
साक्षी ही है । अज्ञानरूप उपाधि से युक्त आत्मा अज्ञान के साथ है । ईश्वर एक है ।
अद्वैतवाद के दो पक्ष हैं— १. आत्मा-परमात्मा की एकता
२. ब्रह्म-जगत् की एकता
वेदान्त में 'प्रतिबिम्बवाद' 'दृष्टिसृष्टिवाद' 'अवच्छेदवाद' 'अजातवाद' आदि
अनेक दृष्टियाँ हैं । पैगम्बरी 'एकेश्वरवाद (Monotheism) (तौहीद) और औपनिष-
दिक अद्वैतवाद (Monism) में यथेष्ट भेद है ।
जगत् का स्वरूप—'जगत' प्रातिभासिक है पारमार्थिक सत्य नहीं है । सत्य की
तीन कोटियाँ हैं—१. व्यावहारिक २. प्रतिभासिक ३. पारमार्थिक । इनमें जगत् की सत्ता