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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 171

७० स्पन्दकारिका
बिम्बित होने पर उससे अभिन्न होने पर भी दर्पण में तथा परस्पर भी भिन्न प्रतीत होते हैं
उसी प्रकार पूर्ण संविद्रूप परमेश्वर में प्रतिबिम्बित यह जगदाभास अभिन्न होने पर भी घट
पटादि रूप से अवभासित होता है । लोक में प्रतिबिम्बित पदार्थ की सत्ता बिम्बाश्रित
होती है किन्तु त्रिकनय में ('स्वातन्त्र्यशक्ति' के चमत्कार द्वारा) बिना बिम्ब के ही जगद्रूप
प्रतिबिम्ब स्वतः आविर्भूत होता जाता है । द्वैतभावना कल्पित है अद्वैतभावना ही
यथार्थ है । इसी आभास या प्रतिबिम्ब सिद्धान्त के मानने के कारण त्रिकदर्शन की
दार्शनिक दृष्टि—'आभासवाद' मानी जाती है—'आभासरूपा एवं जडचेतन पदार्थाः ।।
(प्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी ३।२।१) अभिनव विवृतिविमर्शिनी में कहते हैं—
अन्तर्विभाति सकलं जगदात्मनीह,
यद्वद् विचित्ररचना मुकुरान्तराले ।
बोधःपुनर्निजविमर्शनसारयुक्त्या,
विश्वं परामृशति नो मुकुरस्तथा तु ॥
'स्वातन्त्र्यवाद'—त्रिकनय में 'स्वातन्त्र्यवाद' भी स्वीकृत है और यही त्रिकनय का
प्रधान सिद्धान्त है । विश्व चिन्मयी शक्ति का स्फुरण है—अतः इसे 'परिणाम' एवं
'विवर्त' दोनों न मानकर सत्य ही माना जाना चाहिए । 'परिणामवाद' में वस्तु का अपना
स्वरूप तिरोहित होकर दूसरे आकार को ग्रहण कर लेना माना जाता है यथा दूध का पर
स्वरूप दही । दही पुनः दूध नहीं बन सकता । प्रकाशवपु शिव के प्रकाश के तिरोधान
होने पर तो विश्व अंधा हो जाएगा । परिणामतः 'विवर्तवाद' एवं 'परिणामवाद' दोनों
स्वीकार्य नहीं है । स्वीकार्य है तो अघटन घटनापटीयसी, कर्तुं—अकर्तुं—अन्यथाकर्तुं
की शांभवी स्वातन्त्रशक्ति का सिद्धान्त 'स्वातन्त्र्यवाद' इसका स्वरूप क्या है?
अभिनवगुप्तपादाचार्य कहते हैं—
'अविद्या अनिर्वाच्या वैचित्र्यं चाधत्ते इति व्याहतम् । परमेश्वरी शक्तिरेव इयमिति
हृदयावर्जकः क्रमः । तस्मात् अनपह्नवनीयः प्रकाशविमर्शात्मा संवित्स्वभावः परमशिवः
भगवान् स्वातन्त्र्यादेव प्रकाशते इत्ययं स्वातन्त्र्यवादः प्रोन्मीलितः ।। (अभिनवगुप्त—
प्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी)
यही शक्ति 'विमर्श' भी है जिसका स्वरूप इस प्रकार है-'विमर्शो नाम विश्वाकारेण
विश्वप्रकाशेन विश्वसंहारेण च अकृत्रिमाहमिति स्फुरणम्' ('परा प्रावेशिका') ।।
यदि यह कहा जाय कि परमात्मा नहीं उसकी शक्ति में कर्तृत्व है अतः त्रिक
को ईश्वर (परमशिव) एवं वेदान्त के निष्क्रिय ब्रह्म में क्या भेद है?—तो इसका उत्तर यह
है कि—
१. ब्रह्म की शक्ति 'माया' (कर्तृत्वशक्ति) ब्रह्म में न समवेत है । न चित् है और
सत्यासत्य या नित्य है प्रत्युत् अनिर्वचनीय है इसीलिए वेदान्त 'अनिर्वचनीयतावाद'
सिद्धान्त का पोषक है ।
२. परमशिव की शक्ति 'स्वातन्त्र्यशक्ति' (माया)—परमशिव में समवेत, उसमें
अभिन्नतयावस्थित, नित्य एवं सर्वकर्तृत्वशालिनी परा चित् शक्ति है और—