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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 139 of 519

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Page 139

३८ स्पन्दकारिका
भट्टकल्लट ने ‘स्पन्दकारिकावृत्ति’ (स्पन्दसर्वस्व) में इस संपूर्ण कारिका की
व्याख्या इस प्रकार की है—
‘अनेन स्वस्वभावस्यैव शिवात्मकस्य संकल्पमात्रेण जगदुत्पत्तिसंहारयोः कारणत्वं,
विज्ञानदेहात्मकस्य शक्तिचक्रैश्वर्यस्योत्पत्तिहेतुत्वं नमस्कारेण प्रतिपाद्यते ।।'¹ भट्टकल्लट
स्पन्दशास्त्र में ‘ईश्वरसंकल्पसृष्टिवाद’ का प्रतिपादन करते हैं ।² वे कहते हैं कि इस
कारिका में दो बातें प्रमुख रूप से कही गई हैं ।³
(क) स्वस्वभाव शिव के ‘शिवात्मक संकल्प’ से ही जगत् की उत्पत्ति हुई है ।⁴
अतः शिव को जगत् की उत्पत्ति संहार का कारण सिद्ध किया गया है ।⁵
(ख) विज्ञानदेहात्मक (विमर्शात्मक स्फुरणा) शक्ति चक्र के ऐश्वर्य (अनन्तरूपों में
प्रवहमान होने एवं एक ही साथ भेदशून्य सामान्य भूमिका में विश्रान्त भी रहने की एक
साथ दो) भूमिकायें निभाने के स्वातन्त्र्य चमत्कार के भी वे मूलोद्गम शङ्कर ही हैं ।⁶
‘तं शङ्करं’—(श्रेयसःकर्तारं) श्रेयसम्पाक ।
‘स्तुमः’ (प्रशंसामः)—प्रशंसा करता हूँ । जगतो = (विश्वस्य)—संसार के ।
‘यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां’—(शक्तिप्रसरप्रलयाभ्यां) शक्ति के प्रसार एवं शक्ति के
संकोच ।। ‘प्रलयोद्भवौ’ = विनाश एवं प्रादुर्भाव ।।
‘शक्तिचक्रविभवप्रभवं’—वक्ष्यमाणस्वरूप वाली शक्तियों के
चक्र = समूह ।। ‘विभव’—ऐश्वर्य । ‘प्रभवं’—कारण ।
प्रश्न—शङ्कर भगवान् तो नित्य, अव्यभिचारी रूप से एकस्वभाव, अद्वैत (‘एक
एव’) पदार्थ हैं फिर उनके साथ परस्परविरुद्ध अनित्य, निमेषोन्मेषात्मक अवस्थाओं का
संबन्ध कैसे प्रतिपादित किया गया ?
‘शङ्कर उन्मिषित भी होते हैं और निमिषित भी’ यह कैसे संभव है? यदि
कर्तृत्वप्रथा के कारण ऐसा कहा गया तो नित्यात्मक भगवान् के साथ अनित्यावस्था-
योगित्व कैसा ? कैसे कहा गया ?—‘यस्योन्मेषनिमेषाभ्याम्’ ? यह क्यों कहा गया ?
उत्तर—इस संदर्भ में प्रयुक्त ये ‘उन्मेष-निमेष’ शब्द उपचारित वृत्ति द्वारा शङ्कर
की इच्छामात्र के बोधक हैं । यह तो उनका नित्यधर्म या स्वभाव है—‘स च तस्य
नित्योधर्मः स्वभावभूतः ।।' उन्मेषनिमेषशब्दवाच्यत्व उपचार की दृष्टि से संगत है ।
यह जगत् परमेश्वर की मायाशक्ति के द्वारा उद्भावित एक कार्य है और इसलिए
इसका प्रादुर्भाव एवं प्रलय दोनों होने से यह अनित्य है ।
‘उन्मेषोन्मेष’—ये दोनों ईश्वरेच्छामात्रनिमित्तक हैं । जो उदयात्मक उन्मेष है और
जो प्रलयात्मक निमेष है ये दोनों ही ईश्वरेच्छामात्र है—‘उदयात्मकोन्मेषहेतुत्वात् ईश्वरेच्छैव
उन्मेषशब्देन, प्रलयात्मकनिमेषहेतुत्वात् निमेषशब्देन च उपचर्यते ।।'
१-६. स्पन्दकारिकावृत्ति (भट्टकल्लट) ।