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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 135 of 519

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Page 135

३४ स्पन्दकारिका
ज्ञान-अणिमादिकप्रप्ति स्वविषयाभोगसमयपूर्णप्रथावाप्त्याद्यनन्त क्षुद्राक्षुद्रसिद्धि लाभ या
ऐश्वर्य प्राप्ति ।'—
'अनन्त क्षुद्राक्षुद्रसिद्धि लाभम् ऐश्वर्यं प्राति पूरयति यः, स शक्तिचक्रविभवप्रः स च
असौ ... भवति तेन तेन रूपेण इति कृत्वा, 'तं' = शक्तिचक्रविभव प्रभवं' इति ।'
इसी की पुष्टि में विभूतिस्पन्द में कहा गया है—
(१) यथेच्छाभ्यर्थितो धाता ... (३।१)
(२) कुतः सा स्यादहेतुका । (३।८) आदि ।
इस श्लोकाष्टक द्वारा इस दृष्टि को ही प्रतिपादित किया गया है । ('स्पन्द-
संदोह'—आचार्य क्षेमराज)
आचार्य क्षेमराज ने 'स्पन्दसन्दोह' में इस आद्य कारिका के सात अर्थ बताए हैं ।
इस कारिका का अर्थबोधन कराने हेतु इसकी सप्तविध व्याख्यायें प्रस्तुत की हैं ।
(ग) 'दिक्चरी'—दिक्ार्यस्तु भ्रान्तचक्रवत् सर्वत्र चरन्त्यः परापरसिद्धिप्रवणाः ।
(घ) 'भूचरी'—भूचर्यस्तु स्वस्वभावतयैव कुंकुमनारिकेलादिवत् तत्तत्पीतादिभूमि-
जाताः पूर्णत्वादिनानाभेदितत्तद्देवतांशकोद्भूताः ॥
(१) 'शक्ति'—ब्राह्म्यादि देवी (कादि क्षान्त मातृका वर्ग) ब्रह्मादिकारणमाला ।
'चक्र'—उनसे सम्बद्ध चक्र । 'शक्तयो ब्राह्म्यादि देव्यो (कादि क्षान्त तत्तद्वाचकात्मनः)
ब्रह्मादिकारणमाला च' तासां सम्बन्धिचक्रं स्वभावशून्यपशुप्रमातुः अद्वयरूपोर्ध्वभूम्यता-
रोहणक्षमो भेदमयाधस्सरणिसंचारचतुरश्च व्यूहः' तस्य यो विभवः तथाकार्यकारित्वं तस्य
प्रभावं । तद्वक्ष्यति—'शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य ... (३।१३) इत्यादि । 'बन्धयित्री
... (३।१६) तन्मात्रोदयः ... (३।१७) प्रचक्ष्महे (३।१८) इत्यन्तं च ।।' ('स्पन्दसन्दोह')
आचार्य क्षेमराज ने इस प्रथम कारिका की व्याख्या को 'आदिसूत्र की व्याख्या'
का अभिधान दिया है ।
शाङ्कर अद्वैतवाद का खण्डन—आचार्य क्षेमराज ने 'स्पन्दसंदोह' में कहा है कि
इस श्लोक भाग के द्वारा कारिकाकार ने परमात्मा को 'विश्वोत्तीर्ण' एवं 'विश्वमय' दोनों
सिद्ध किया है । उन्होंने वेदान्त सम्मत उस निष्क्रिय ब्रह्म का प्रतिपादन नहीं किया है
जिसके विषय में कहा गया है कि—'विश्वं यन्न तदेव ब्रह्म' अर्थात् 'जो विश्व नहीं है (जो
विश्वातीतर है) वही ब्रह्म है।'
'एवमनेन श्लोकभागेन ... विश्वोत्तीर्णोविश्वमयश्च उत्तमाकुलत्रिकाद्याम्नायोपदेशदिशा
स्वस्वभाव एव शङ्करः इति उपपादितम न तु वेदान्तवादितवत—'विश्वं यन्न तदेव ब्रह्म'।१
'विश्वं यन्न' में जो अभाववाद का आभास मिलता है उसका कारिकाकार ने अपनी
निम्न कारिका द्वारा प्रतिषेध भी किया है—
१. स्पन्दसन्दोह—क्षेमराज ।