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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 129

२८ स्पन्दकारिका
प्रलय हो जाता है । (‘निमेषाद्विश्रामात् प्रलयोऽप्ययः ।’)^१ इन शङ्कर के अतिरिक्त अन्य
किसी के द्वारा जगत् की सृष्टि एवं प्रलय हो पाना संभव नहीं है (‘न ह्येतद्व्यतिरिक्तस्य
जगतोऽस्त्युदयोऽप्ययो वा’:) ‘किन्त्वीशशक्ति प्रसरविरामौ प्रभवाप्ययौ ।’
कहा भी गया है—
‘समुदेति जगदशेषं तवोदयविमलसंविदाकारे ।
अस्तं याति समस्तं पुनरपि निजरूपरूढायाः ॥’
‘तत्त्वविचार’ में कहा गया है—
‘शक्तिप्रसरसंकोचनिबद्धावुदयव्ययौ ।
यस्यात्मा स शिवो ज्ञेयः सर्वभावप्रवर्तकः ॥’^२
‘कक्ष्यास्तोत्र’ में भी कहा गया है—
त्वदाशयोन्मेषनिमेषमात्रमयौ जगत्सर्गलयावितीदृक् ।
स्फुटे स्फुटं त्वन्महिमाऽवभाति विचित्रनिर्माणनिदर्शनेन ॥
ज्ञानक्रियादिगर्भेच्छा शक्तिर्यः प्रसरात्मकः ।
संकल्पोक्तः स उन्मेषः प्रोक्तं ह्येतत् स्वतन्त्रके ।
यत्र यत्र भवेदिच्छा ज्ञानं तत्र प्रवर्तते ।
क्रियाकरणसंयोगात् पदार्थस्योदयो भवेत् ॥^३
‘निमेष’ = उन्मेष से विरति ।^४
प्रश्न—ग्रन्थकार ने ‘उदयप्रलयौ’ न कहकर ‘प्रलयोदयौ’ क्यों कहा? पहले ‘उदय’
होता है फिर ‘प्रलय’ । लेकिन ग्रन्थकार ने ‘उदयप्रलयौ’ कहने के स्थान में ‘प्रलयोदयौ’
इसलिए कहा क्योंकि अन्यथा इस श्लोक में वृत्त-भंग दोष आ जाता ?^५ हाँ यह बात ही
ध्यातव्य है कि ग्रन्थकार ने ‘प्रलय’ शब्द के प्राथमिक प्रयोग से बचने के लिए श्लोकारंभ
में ‘उन्मेष’ शब्द का प्रयोग किया जो कि मंगलवाची है ।^६
उन्मेष-निमेष—पदों के प्रयोग में रहस्यार्थ—ग्रन्थकार ने ‘उन्मेष’ एवं ‘निमेष’
शब्द का ग्रन्थारंभ में (मंगलाचरण में) प्रयोग करके एक ओर तो वेदान्त के निष्क्रिय ब्रह्म
की अमान्यता एवं शिवाद्धयवादोक्त ब्रह्म की सक्रिया, (पञ्चकृत्यकारित्व) को संकेतित
किया वहीं उन्होंने इन शब्दों द्वारा परम पुरुषार्थों की ओर भी इंगित किया है क्योंकि
‘उन्मेष’ एवं ‘निमेष’ का अर्थ ‘भोग-मोक्ष’ भी है ‘जगत्सृष्टिसंहरयोः कारणभावः प्रोक्तो
भुक्तिमुक्तौ च । तत्रोन्मेषाद्भोगो नानाविधः । निमेषान्मोक्षो निस्तरंगरूपता ।’^७
शक्तिचक्रविभवप्रभव—‘शक्ति’-‘शक्तिचक्र’ ‘इच्छाख्यैका विभोः शक्तिः प्राग्द्विधा
ज्ञ क्रियाभिदा’ इस शक्ति के विभिन्न रूप हैं इसीलिए ‘शक्तिचक्र’ (शक्तिसमूह) कहा गया ।
‘मालिनीविजय’ में इसी अद्वितीया शक्ति के नानात्व का इस प्रकार वर्णन किया गया है।
१. स्पन्दप्रदीपिका । २. तत्त्वविचार ।
३. कक्ष्यास्तोत्र । ४-७. स्पन्दप्रदीपिका ।