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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 126 of 519

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Page 126

प्रथमः निष्यन्दः २५
'शक्तिचक्रस्य' = करणेopenedचक्र का—अर्थात् करणरूप शक्तिवर्ग का । 'विभव' =
विचित्र सृष्टिसंहारादिकारित्व । 'प्रभवं' = उसके क्रमार्थावभासनकारित्वकृत अक्रम महा-
प्रकाशमय को । कहा भी गया है—'सहान्तरेण चक्रेण प्रवृत्तिस्थितिसंहती:' (१।६)१
'चक्र'—आन्तरचक्र (न कि अन्तःकरणत्रय क्योंकि वह करणवर्ग के रूप में स्वीकृत है ।)
'शक्तिचक्रं'—मन्त्रगण में मुद्रासमूह । 'विभव:'—उसका जो विभव है अर्थात्
त्रिविध सिद्धि-साधन-समर्थत्व । 'प्रभवं'—क्षितोत्पत्तिविश्रानितस्थान ।२ कहा भी गया
है— 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः ।
प्रवर्त्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनः ।। (२६)३
'अत्रैव संप्रलीयन्ते शान्तरूपा निरञ्जनाः ।' (२।१)
'विभव'—त्रिविधा सिद्धि—१. पर २. अपर ३. परापर । ('विभव' ) ।।
आचार्य क्षेमराज का कथन है कि—'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ'
श्लोक में यद्यपि परमात्मा के मात्र दो कृत्यों (१) सृष्टि एवं (२) प्रलय मात्र का ही उल्लेख
किया गया है तथापि यह पञ्चकृत्यों का सूचक (उपलक्षणक) है । परमात्मा के पञ्चकृत्य हैं
क्या?—'आभासन-रक्ति-विमर्शन-बीजावस्थापन-विलापनात्म-पञ्चविधकृत्यानि' ।
'ईश्वराद्वयदर्शन' एवं ब्रह्मवादी दर्शन में भेद-दृष्टि—ईश्वराद्वयवादी परमात्मा में
पञ्चकृत्यों की विद्यमानता स्वीकार करते हैं किन्तु ब्रह्मवादी वेदान्ती नहीं स्वीकार करता ।
'तथापि तद्वत् पञ्चकृत्यानि करोति ।। १० ।।
इह ईश्वराद्वयदर्शनस्य ब्रह्मवादिभ्यः श्रयमेव विशेषः यत्—
'सृष्टि-संहारकर्तारं विलयस्थितिकारकम् ।
अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ।।'
इति श्रीमत्स्वच्छादि शासनेाक्तनीत्या सदा पञ्चविधकृत्यकारित्वं चिदात्मनो भग-
वतः । यथा च भगवान् शुद्धेतराध्व स्फारक्रमेण स्वस्वरूपविकासरूपाणि सृष्ट्यादीनि
करोति, 'तथा'—संकुचितचिच्छक्तितया संसारभूमिकायामपि 'पञ्चकृत्यानि' विधत्ते ।'४
आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि—देह प्राणादि पद में प्रविष्ट होते हुए, चिदात्मा
महेश्वर, बहिर्मुख होने की दशा में नीलादि वस्तु को नियत देश एवं नियत काल में वस्तु
का आभास होना ही 'सृष्टि' है । नियत देशकाल में भिन्न अन्य आभासांश ही 'संहार'
है । नीलाद्याभासांश में स्थापकता, वस्तुओं का ऐक्यभाव से प्रकाशन ही 'अनुग्रह' है ।
इसके अतिरिक्त भगवान् के सतत पञ्चविध कृत्यकारित्व का विस्तार से मैंने 'स्पन्द-
सन्दोह' में निर्णय किया है ।'५
परमात्मा के पञ्चकृत्य
आभासन रक्ति विमर्शन बीजावस्थापन विलापन
१. स्पन्दकारिका । २. स्पन्दसन्दोह ।
३. स्पन्दकारिका । ४-५. आचार्य क्षेमराज—प्रत्यभिज्ञाहृदयम्।